जानें क्यों मनाया जाता है बैसाखी का पर्व

बैसाखी हर्ष और उल्लास का पर्व है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार हर साल 13 अप्रैल को बैसाखी पर्व मनाया जाता है, जिसे देश के भिन्न-भिन्न भागों में रहने वाले सभी धर्मपंथ के लोग अलग-अलग तरीके से मनाते हैं। वैसे कभी-कभी 12-13 वर्ष में यह त्योहार 14 तारीख को भी आ जाता है। इस बार बैसाखी 14 तारीख को है। आइए जानते क्यों मनाया जाता है बैसाखी का पर्व।

अप्रैल में क्यों मनाते हैं बैसाखी

बैसाखी मुख्यत: कृषि पर्व है, जिसे दूसरे नाम से ‘खेती का पर्व’ भी कहा जाता है। यह पर्व किसान फसल काटने के बाद नए साल की खुशियों के रूप में मानते हैं। इस महीने अनाज फसल पूरी तरह से पक कर तैयार हो जाती है और पकी हुई फसल को काटने की शुरुआत भी हो जाती है। किसान प्रकृति को अच्छी फसल के लिए धन्यवाद देते है।

खालसा पंथ की स्थापना

इस दिन सिखों के दसवें गुरु – गुरु गोविंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की नींव रखी थी और आनंदपुर साहब के गुरुद्वारे में पांच प्यारों से वैशाखी पर्व पर ही बलिदान के लिए आह्वान किया गया था। ‘खालसा’ खालिस शब्द से बना है, जिसका अर्थ शुद्ध, पावन या पवित्र होता है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरुओं की वंशावली को समाप्त कर दिया।

इसके बाद सिख धर्म के लोगों ने गुरु ग्रंथ साहिब जी को अपना मार्गदर्शक बनाया। खालसा पंथ की स्थापना के पीछे गुरु गोविंद सिंह जी का मुख्य लक्ष्य लोगों को तत्कालीन मुगल शासकों के अत्याचारों से मुक्त कर उनके धार्मिक, नैतिक और व्यावहारिक जीवन को श्रेष्ठ बनाना था। इस पंथ के द्वारा गुरु गोविंद सिंह जी ने लोगों को धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव छोड़कर इसके स्थान पर मानवीय भावनाओं को आपसी संबंधों में महत्व देने की भी दृष्टि दी।

ऐसे मनाते हैं बैसाखी

इस दिन अरदास के लिए श्रद्धालु गुरुद्वारों में जाते हैं। आनंदपुर साहिब में बैसाखी का मेला लगता है, वहां दुनियाभर से बहुत भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। सभी गुरुद्वारों में ‘पंचबानी’ का पाठ पढ़ा जाता है और अरदास के बाद गुरु जी को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है। प्रसाद भोग लगने के बाद सब भक्त ‘गुरु जी के लंगर’ में भोजन करते हैं।

रात होते ही आग जलाकर उसके चारों तरफ एकत्र होते हैं और फसल कटने के बाद आए धन की खुशियां मनाते हैं। नए अन्न को अग्नि को समर्पित किया जाता है और पंजाब का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है।

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