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छह मुख वाले बेटे की मां: स्कंदमाता की पावन कथा, जिसमें ममता भी है और वीरता भी

नवरात्र का पांचवां दिन मां स्कंदमाता को समर्पित है। वे मां दुर्गा की पांचवीं शक्ति हैं। उनके नाम में ही उनकी पहचान छिपी है। स्कंद यानी भगवान कार्तिकेय और माता यानी मां। यानी स्कंद की माता। यह कथा सिर्फ एक देवी की नहीं है। यह एक ऐसी मां की कहानी है जिसने अपने बेटे को प्यार भी दिया और दुनिया बचाने की ताकत भी दी।

Skandamatas-Sacred-katha

नाम का मतलब क्या है

शब्द मतलब
स्कंद भगवान कार्तिकेय का एक नाम
माता मां
स्कंदमाता कार्तिकेय की मां

भगवान कार्तिकेय के और भी कई नाम हैं।

नाम कहां ज्यादा प्रचलित
कार्तिकेय पूरे भारत में
स्कंद, कुमार उत्तर भारत और शास्त्रों में
षण्मुख छह मुखों के कारण
मुरुगन तमिलनाडु और दक्षिण भारत

कथा की शुरुआत: तारकासुर का वरदान

बहुत पुरानी बात है। एक राक्षस था तारकासुर। वह बहुत ताकतवर और बहुत चालाक था। उसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। सालों तक अन्न-जल छोड़कर साधना की। आखिर ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए। तारकासुर ने कहा, “मुझे अमर कर दीजिए।” ब्रह्मा जी ने समझाया, “जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी तय है। कोई और वरदान मांगो।” तारकासुर थोड़ी देर सोचता रहा। फिर उसने एक चालाकी भरी बात कही।

“ठीक है। मेरी मृत्यु सिर्फ शिव जी के पुत्र के हाथों हो।”

तारकासुर ने ऐसा क्यों मांगा

तारकासुर की सोच बहुत सीधी थी।

उसकी सोच मतलब
शिव जी तो गहरी तपस्या में रहते हैं वे कभी विवाह नहीं करेंगे
विवाह नहीं होगा तो पुत्र भी नहीं होगा
पुत्र नहीं होगा तो मुझे कोई हरा नहीं पाएगा

उस समय शिव जी की पत्नी सती अपने प्राण त्याग चुकी थीं। शिव जी गहरे ध्यान में बैठे थे। इसलिए तारकासुर को लगा कि वह लगभग अमर हो चुका है। ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया।

तीनों लोकों में आतंक

वरदान मिलते ही तारकासुर का घमंड आसमान पर पहुंच गया।

  • उसने देवताओं को स्वर्ग से भगा दिया।
  • ऋषि-मुनियों की पूजा और यज्ञ रुकवा दिए।
  • प्रजा पर अत्याचार किए।
  • तीनों लोकों में डर फैल गया।

परेशान देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, हमें इस राक्षस से बचाइए।”

ब्रह्मा जी ने बताया, “इसे सिर्फ शिव जी का पुत्र ही मार सकता है। पहले शिव जी का विवाह होना जरूरी है।”

शिव जी को जगाने की कोशिश

अब देवताओं के सामने एक बड़ी मुश्किल थी। शिव जी तो गहरी समाधि में थे।

उधर सती ने अगला जन्म हिमालय के घर पार्वती के रूप में लिया था। पार्वती बचपन से शिव जी को पाना चाहती थीं।

देवताओं ने सोचा कि शिव जी का ध्यान तोड़ना होगा। इसके लिए उन्होंने कामदेव को भेजा। कामदेव ने शिव जी की समाधि भंग करने की कोशिश की।

शिव जी की आंख खुली। वे बहुत नाराज हुए। कथा के अनुसार, उनके क्रोध से कामदेव भस्म हो गए।

यह देखकर देवता घबरा गए। पर पार्वती जी ने हार नहीं मानी।

पार्वती की तपस्या

पार्वती जी ने तय कर लिया कि वे तप से शिव जी को मनाएंगी। उन्होंने राजमहल छोड़ दिया और जंगल में कठोर तपस्या शुरू कर दी। इस तप की कहानी हम मां ब्रह्मचारिणी की कथा में पढ़ चुके हैं। सालों की साधना के बाद शिव जी प्रसन्न हुए। उन्होंने पार्वती को अपनी अर्धांगिनी स्वीकार किया। दोनों का विवाह हुआ। इसी विवाह की अनोखी बारात की कथा हमने मां चंद्रघंटा के रूप में पढ़ी थी।

स्कंद का जन्म

अब बारी थी उस बालक के जन्म की, जिसका सबको इंतजार था। कार्तिकेय के जन्म की कथा अलग-अलग ग्रंथों में थोड़े अलग रूपों में मिलती है। पर लोकप्रिय कथा कुछ इस तरह है।

क्रम क्या हुआ
पहले शिव जी का तेज बहुत प्रचंड था, जिसे कोई संभाल नहीं सका
फिर वह तेज अग्नि देव और गंगा जी से होता हुआ आगे बढ़ा
उसके बाद वह तेज एक पवित्र सरोवर (सरवण) में पहुंचा
वहां उस तेज से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ
फिर छह कृत्तिकाओं (अप्सराओं) ने उसे पाला
इसीलिए उनका नाम पड़ा कार्तिकेय

छह माताओं ने जब उन्हें दूध पिलाया, तो बालक के छह मुख प्रकट हो गए। इसीलिए वे षण्मुख भी कहलाए।

मां पार्वती की गोद में

बालक को जब मां पार्वती ने देखा, तो उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने उसे अपनी गोद में उठा लिया। उसे गले से लगाया और अपना बेटा स्वीकार किया। उस दिन से मां पार्वती स्कंदमाता कहलाईं। इसी रूप में मां की पूजा होती है। उनकी गोद में छह मुख वाला बालक बैठा होता है। मां के चेहरे पर ममता और हाथों में अभय का आशीर्वाद होता है।

मां ने बेटे को सिर्फ लाड़ नहीं दिया

यह कथा का सबसे खूबसूरत हिस्सा है। मां ने स्कंद को सिर्फ प्यार नहीं किया। उन्होंने उसे मजबूत भी बनाया।

मां ने क्या दिया मतलब
युद्ध की कला ताकि वह राक्षसों से लड़ सके
ज्ञान और विवेक ताकि वह सही-गलत पहचाने
शक्ति और आशीर्वाद ताकि वह हर मुश्किल में डटा रहे
साहस ताकि वह कभी डरे नहीं

स्कंदमाता को विद्यावाहिनी दुर्गा भी इसीलिए कहा जाता है।

सेनापति बने स्कंद

जब कार्तिकेय बड़े हुए, तो देवता उनके पास पहुंचे। उन्होंने कहा, “प्रभु, अब आप ही हमारी सेना का नेतृत्व कीजिए।” कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति बने। विदा के समय मां ने अपने बेटे को आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा, “बेटा, धर्म के रास्ते पर चलना। बुराई के आगे मत झुकना। मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है।”

तारकासुर का अंत

फिर युद्ध शुरू हुआ। एक तरफ घमंडी तारकासुर की विशाल सेना थी। दूसरी तरफ देवताओं की सेना, जिसके सेनापति थे कार्तिकेय। युद्ध बहुत भयंकर था। तारकासुर ने खूब जोर लगाया। पर इस बार उसका सामना शिव जी के पुत्र से था। यही वह घड़ी थी जिसका उसने वरदान में जिक्र किया था। कार्तिकेय ने मां के आशीर्वाद और अपने पराक्रम से तारकासुर का अंत कर दिया। तीनों लोकों में खुशी की लहर दौड़ गई। देवताओं को उनका स्वर्ग वापस मिल गया। ऋषि-मुनि फिर से पूजा-पाठ करने लगे।

मां का स्वरूप

स्वरूप क्या बताता है
गोद में बालक स्कंद मां की ममता
चार भुजाएं हर दिशा में रक्षा
दो हाथों में कमल शुद्धता और शांति
एक हाथ में बालक संतान का पालन-पोषण
एक हाथ अभय मुद्रा में “डरो मत, मैं हूं”
कमल का आसन इसीलिए पद्मासना देवी नाम
सिंह की सवारी निडरता

इस कथा से हम क्या सीखें

1. मां की ममता सबसे बड़ी ताकत है
मां का आशीर्वाद हर मुश्किल में कवच बन जाता है।

2. बच्चे को सिर्फ लाड़ न दें
उसे अच्छे संस्कार दें, ज्ञान दें और मजबूत बनाएं।

3. घमंड हमेशा हारता है
तारकासुर कितना भी ताकतवर था, आखिर में उसका अंत हुआ।

4. सही समय का इंतजार करें
देवताओं ने हड़बड़ी नहीं की। उन्होंने सही समय पर सही कदम उठाया।

5. परिवार की एकता जरूरी है
शिव, पार्वती और कार्तिकेय, तीनों की भूमिका से ही बुराई का अंत हुआ।

आज की जिंदगी में यह कथा क्यों जरूरी है

आज के माता-पिता बच्चों को खूब सुविधाएं देते हैं। पर कई बार बच्चों को मजबूत बनाना भूल जाते हैं। स्कंदमाता की कथा हमें यही याद दिलाती है।

  • बच्चों को प्यार दीजिए। साथ ही अनुशासन भी सिखाइए।
  • उन्हें अच्छी बातें बताइए।
  • उनकी बात ध्यान से सुनिए।
  • उन्हें गलती से सीखना सिखाइए।
  • उनके साथ रोज थोड़ा वक्त बिताइए।

और बच्चों के लिए संदेश यह है कि मां की सीख को हल्के में मत लीजिए। उसी में आपकी ताकत छिपी है।

कथा सुनने के बाद पूजा कैसे करें

  1. सुबह नहाकर साफ कपड़े पहनें।
  2. कलश के पास मां की तस्वीर रखें।
  3. रोली, चंदन और चावल चढ़ाएं।
  4. कमल या पीले फूल अर्पित करें।
  5. घी का दीया जलाएं।
  6. केले का भोग लगाएं।
  7. मंत्र का जाप करें।
  8. आरती करके प्रसाद बांटें।

बीज मंत्र

ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥

ध्यान मंत्र

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. स्कंदमाता कौन हैं?
वे मां दुर्गा का पांचवां रूप हैं। वे भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं।

2. तारकासुर कौन था?
एक शक्तिशाली राक्षस, जिसे वरदान मिला था कि उसकी मृत्यु सिर्फ शिव जी के पुत्र के हाथों होगी।

3. कार्तिकेय के छह मुख क्यों हैं?
कथा के अनुसार, छह कृत्तिकाओं ने उन्हें दूध पिलाया था, इसलिए उनके छह मुख प्रकट हुए।

4. मां को पद्मासना देवी क्यों कहते हैं?
क्योंकि वे कमल के आसन पर बैठती हैं।

5. मां का वाहन क्या है?
सिंह, यानी शेर।

6. मां को कौन सा भोग पसंद है?
केला।

7. यह कथा किन ग्रंथों में मिलती है?
शिव पुराण, स्कंद पुराण और अन्य ग्रंथों में अलग-अलग रूप में।

स्कंदमाता की कथा हमें एक प्यारी सीख देती है। सच्चा प्यार वही है, जो बच्चे को लाड़ भी दे और उसे मजबूत भी बनाए। आज मां के आगे दीया जलाइए। केले का भोग लगाइए। अपने बच्चों और अपनी मां की सलामती की दुआ कीजिए। मां स्कंदमाता आपके घर को ममता, शक्ति और खुशहाली से भर दें।

जय माता दी!

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