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ममता और शक्ति का संगम: मां स्कंदमाता की पूजा विधि, कथा, भोग, मंत्र और आरती

आज नवरात्र का पांचवां दिन है। आज मां दुर्गा की पांचवीं शक्ति, मां स्कंदमाता, की पूजा होती है। इनका नाम ही इनकी पहचान है। स्कंद यानी भगवान कार्तिकेय और माता यानी मां। मां स्कंदमाता का मतलब है, स्कंद की माता। इस रूप में मां की ममता और ताकत, दोनों एक साथ दिखती हैं। एक मां के लिए अपना बच्चा सबसे प्यारा होता है। पर वही मां जरूरत पड़ने पर अपने बच्चे को वीर योद्धा भी बनाती है।

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पांचवां नवरात्र कब है

इस साल पांचवां नवरात्र 15 अक्टूबर, गुरुवार को पड़ रहा है। यह पंचमी तिथि है। गुरुवार का दिन होने से इसका महत्व और बढ़ जाता है।

ध्यान दें: अलग-अलग पंचांगों में तिथि के घटने-बढ़ने से तारीख थोड़ी आगे-पीछे हो सकती है। पूजा से पहले अपने स्थानीय पंचांग या पंडित जी से सही समय जरूर पूछ लें।

आज की पूजा एक नजर में

बात जानकारी
आज की देवी मां स्कंदमाता
नवरात्र का दिन पांचवां
वाहन सिंह (शेर)
भुजाएं चार
गोद में बालक कार्तिकेय (स्कंद)
प्रिय भोग केला
बीज मंत्र ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः

कौन हैं मां स्कंदमाता

मां स्कंदमाता, पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती का वह रूप हैं जिसमें वे भगवान कार्तिकेय की माता हैं। भगवान कार्तिकेय के कई नाम हैं।

नाम कहां ज्यादा प्रचलित
स्कंद उत्तर भारत
कार्तिकेय पूरे भारत में
कुमार शास्त्रों में
षण्मुख दक्षिण भारत
मुरुगन तमिलनाडु

वे देवताओं की सेना के सेनापति माने जाते हैं।

मां का स्वरूप

स्वरूप खास बात
गोद में छह मुख वाले बालक स्कंद
भुजाएं चार
दो हाथों में कमल का फूल
एक हाथ में बालक स्कंद को थामा हुआ
एक हाथ में अभय मुद्रा, यानी “डरो मत”
आसन कमल का फूल
वाहन सिंह
रंग उजला, गोरा और शांत

मां कमल पर विराजमान होती हैं। इसलिए उन्हें पद्मासना देवी भी कहते हैं। भक्त उन्हें विद्यावाहिनी दुर्गा के नाम से भी जानते हैं।

मां स्कंदमाता की कथा

कथा बहुत रोचक है। इसे आसान भाषा में पढ़िए।

तारकासुर का आतंक

बहुत समय पहले की बात है। एक राक्षस था तारकासुर। वह बहुत शक्तिशाली था। उसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। तारकासुर ने अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने कहा, “जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है।” यह सुनकर तारकासुर ने एक चालाकी भरा वरदान मांगा। उसने कहा, “मेरी मृत्यु सिर्फ भगवान शिव के पुत्र के हाथों हो।” तारकासुर को लगता था कि शिव जी तो गहरी तपस्या में डूबे हैं। वे कभी विवाह नहीं करेंगे। जब पुत्र ही नहीं होगा, तो उसे कौन मारेगा? यही सोचकर वह खुद को अजेय मानने लगा। ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया।

देवताओं की चिंता

वरदान पाकर तारकासुर ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। उसने देवताओं को स्वर्ग से भगा दिया। ऋषि-मुनियों की पूजा रुकवा दी। चारों तरफ डर फैल गया। परेशान देवता भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के पास गए। सबको समझ आ गया कि अब सिर्फ शिव जी का पुत्र ही इसे हरा सकता है।

शिव-पार्वती का विवाह

उधर मां पार्वती कठोर तप करके शिव जी को पाना चाहती थीं। मां ब्रह्मचारिणी की कथा में हमने यह पढ़ा था। उनकी तपस्या सफल हुई। शिव जी और पार्वती का विवाह हुआ।

स्कंद का जन्म

इसके बाद कार्तिकेय का जन्म हुआ। उनके जन्म की कथा अलग-अलग ग्रंथों में अलग रूपों में मिलती है। पर सभी का सार यही है कि वे शिव जी के पुत्र थे। उन्हें पालने की जिम्मेदारी मां पार्वती ने संभाली। इसी रूप में वे स्कंदमाता कहलाईं।

मां की ममता और बेटे की ट्रेनिंग

मां ने बेटे को सिर्फ लाड़ नहीं दिया। उन्होंने उसे युद्ध की हर कला सिखाई। उसे शक्ति दी, ज्ञान दिया और अपना आशीर्वाद दिया। फिर समय आया जब देवताओं ने उन्हें अपना सेनापति चुना। मां ने खुद उन्हें युद्ध के लिए विदा किया।

तारकासुर का अंत

युद्ध हुआ। भगवान स्कंद ने बहादुरी से तारकासुर का सामना किया। मां के आशीर्वाद और अपनी ताकत से उन्होंने उसका अंत कर दिया। देवताओं को स्वर्ग वापस मिल गया। तीनों लोकों में फिर से शांति लौट आई।

इस कथा से हम क्या सीखें

सीख मतलब
मां की ममता सबसे बड़ी ताकत है मां का आशीर्वाद हर मुश्किल में साथ देता है
बच्चे को सिर्फ लाड़ न दें उसे मजबूत और समझदार भी बनाएं
सही समय का इंतजार करें देवताओं ने सही समय पर सही उपाय किया
बुराई चाहे जितनी बड़ी हो, हारती जरूर है तारकासुर कितना भी ताकतवर था, अंत में हार गया
परिवार में एकता जरूरी है मां, पिता और पुत्र, सबकी भूमिका थी

पांचवें दिन इनकी पूजा क्यों

मान्यता है कि मां स्कंदमाता की पूजा से:

  • संतान सुख मिलता है। जो दंपति संतान की इच्छा रखते हैं, वे इस दिन खास पूजा करते हैं।
  • बच्चों की रक्षा होती है। मां अपनी संतान की तरह भक्तों की भी रक्षा करती हैं।
  • पढ़ाई और ज्ञान में लाभ होता है। इन्हें विद्यावाहिनी भी कहा जाता है।
  • मन शांत रहता है।
  • घर में सुख-शांति आती है।

मान्यता है कि मां की साधना से विशुद्धि चक्र मजबूत होता है। इसे गले का चक्र माना जाता है और यह बोलचाल से जुड़ा है। इसे अपनी श्रद्धा के अनुसार मानें। कहा जाता है कि मां की पूजा से भगवान कार्तिकेय की भी पूजा हो जाती है। इसलिए एक पूजा में दो लाभ माने जाते हैं।

पूजा की सामग्री

सामग्री किसलिए
मां की तस्वीर या मूर्ति पूजा के लिए
रोली, चंदन और अक्षत (चावल) तिलक और पूजा के लिए
कमल या पीले फूल मां को चढ़ाने के लिए
घी का दीपक आरती के लिए
धूप और अगरबत्ती वातावरण शुद्ध करने के लिए
गंगाजल शुद्धि के लिए
केले मुख्य भोग
फल और मेवे प्रसाद के लिए
मिठाई भोग के लिए
माला मंत्र जाप के लिए

पूजा की आसान विधि

पहला कदम: स्नान करें
सुबह जल्दी उठें और नहाएं। साफ कपड़े पहनें। कई लोग इस दिन सफेद या हल्के रंग के कपड़े पहनना शुभ मानते हैं। यह परंपरा और पंचांग के अनुसार बदल सकता है।

दूसरा कदम: जगह साफ करें
पूजा की जगह पर गंगाजल छिड़कें। कलश के पास मां की तस्वीर रखें।

तीसरा कदम: संकल्प लें
हाथ में जल और चावल लें। मन में कहें कि आप श्रद्धा से मां की पूजा कर रहे हैं।

चौथा कदम: कलश की पूजा करें
सबसे पहले कलश पर रोली और अक्षत चढ़ाएं। फिर उसके पास दीया जलाएं।

पांचवां कदम: मां का ध्यान करें
आंखें बंद करें। मां की गोद में बैठे बालक स्कंद को याद करें। ध्यान मंत्र पढ़ें।

छठा कदम: पूजन करें
मां को रोली, चंदन और अक्षत चढ़ाएं। कमल या पीले फूल अर्पित करें। फिर धूप और दीप दिखाएं।

सातवां कदम: भोग लगाएं
मां को केले का भोग लगाएं।

आठवां कदम: मंत्र जाप
माला लेकर मंत्र का जाप करें। जितना हो सके, उतना करें।

नौवां कदम: आरती करें
अंत में आरती उतारें। प्रसाद सबको बांटें। चाहें तो केले का प्रसाद किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भी दें।

मां स्कंदमाता को क्या भोग लगाएं

मां को केला बहुत प्रिय माना जाता है। इसलिए आज के भोग में केले जरूर रखें।

भोग खास बात
केला सबसे प्रिय भोग माना जाता है
केले की खीर सात्विक और स्वादिष्ट
दूध से बनी मिठाई शुभ मानी जाती है
मेवे बादाम और किशमिश
फल सेब, अनार या पपीता

ध्यान रहे: भोग साफ-सफाई से बनाएं। उसमें लहसुन-प्याज न डालें। प्रसाद का कुछ हिस्सा बच्चों को देना शुभ माना जाता है।

मान्यता है कि केले का भोग लगाने से घर के सदस्यों की सेहत अच्छी रहती है।

मां स्कंदमाता के मंत्र

बीज मंत्र

ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥

ध्यान मंत्र

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मंत्र शुद्ध उच्चारण से पढ़ें। न आए तो धीरे-धीरे सीख लें। भाव सबसे जरूरी है।

मां स्कंदमाता की आरती

जय तेरी हो स्कंदमाता।
पांचवां नाम तुम्हारा आता॥
सबके मन की जानन हारी।
जग जननी सबकी महतारी॥
तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं।
हरदम तुझे ध्याता रहूं मैं॥
कई नामों से तुझे पुकारा।
मुझे एक है तेरा सहारा॥
कहीं पहाड़ों पर है डेरा।
कई शहरों में तेरा बसेरा॥
हर मंदिर में तेरे नजारे।
गुण गाएं तेरे भक्त प्यारे॥
भक्ति अपनी मुझे दिला दो।
शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो॥
इंद्र आदि देवता मिल सारे।
करें पुकार तुम्हारे द्वारे॥
दुष्ट दैत्य जब चढ़ कर आए।
तू ही खंडा हाथ उठाए॥
दासों को सदा बचाने आई।
‘चमन’ की आस पुजाने आई॥

क्या करें और क्या न करें

क्या करें क्या न करें
सुबह जल्दी उठकर पूजा करें पूजा में जल्दबाजी न करें
साफ कपड़े पहनें गंदे कपड़ों में पूजा न करें
बच्चों को साथ बिठाएं बच्चों को डांटें नहीं
सात्विक भोजन करें लहसुन-प्याज और मांसाहार न खाएं
मां का सम्मान करें मां या किसी महिला का अपमान न करें
जरूरतमंद को केला या फल दें किसी का दिल न दुखाएं
घर के बड़ों का आशीर्वाद लें बड़ों से बहस न करें

माताओं के लिए खास संदेश

आज का दिन हर मां के लिए खास है। मां स्कंदमाता हमें याद दिलाती हैं कि मां होना एक बड़ी ताकत है।

  • अपने बच्चे को प्यार दीजिए। पर उसे मजबूत बनाना भी मत भूलिए।
  • उसे अच्छी बातें सिखाइए।
  • उसकी बात धैर्य से सुनिए।
  • खुद का भी ध्यान रखिए। थकी हुई मां बच्चे को पूरा प्यार नहीं दे पाती।

और अगर आप अपनी मां के साथ हैं, तो आज उनके पैर छू लीजिए। उनके साथ थोड़ा वक्त बिताइए।

व्रत रखने वालों के लिए सुझाव

  • दिन में फल, दूध और मेवे लेते रहें।
  • केला जरूर खाएं। इससे ताकत मिलती है।
  • खूब पानी पिएं।
  • सेंधा नमक का ही इस्तेमाल करें।
  • ज्यादा तला-भुना न खाएं।
  • गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और बीमार लोग डॉक्टर की सलाह से ही व्रत रखें। सेहत सबसे जरूरी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. नवरात्र के पांचवें दिन किसकी पूजा होती है?
मां स्कंदमाता की।

2. स्कंदमाता का मतलब क्या है?
स्कंद यानी कार्तिकेय की माता।

3. मां का वाहन क्या है?
सिंह, यानी शेर।

4. मां को कौन सा भोग प्रिय है?
केला।

5. मां की कितनी भुजाएं हैं?
चार भुजाएं।

6. मां को पद्मासना देवी क्यों कहते हैं?
क्योंकि वे कमल के आसन पर विराजमान होती हैं।

7. संतान की इच्छा वाले क्या करें?
श्रद्धा से मां की पूजा करें और केले का भोग लगाएं। लेकिन स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए डॉक्टर से सलाह लेना भी जरूरी है।

8. क्या घर में अकेले पूजा की जा सकती है?
बिल्कुल। मां श्रद्धा देखती हैं, भीड़ नहीं।

मां स्कंदमाता की कथा एक सीधी सीख देती है। सच्चा प्यार वही है, जो अपने बच्चे को लाड़ भी दे और मजबूत भी बनाए। आज मां के आगे दीया जलाइए। केले का भोग लगाइए। अपने बच्चों, अपनी मां और पूरे परिवार की खुशहाली की प्रार्थना कीजिए। मां स्कंदमाता आपके घर को सुख, शांति और ममता से भर दें।

जय माता दी!

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