जानिए महत्व “मकर सक्रांति” का!!

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14 जनवरी, शुक्रवार को “मकर संक्रांति” के दिन पौष माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि है। 14 जनवरी को सूर्य देव का मकर राशि में प्रवेश दोपहर 2.29 बजे होगा। मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में लगभग 1 माह के लिए आते हैं।

इस बार “मकर संक्रांति” की शुरूआत रोहणी नक्षत्र में हो रही है जो शाम 8.18 मिनट तक रहेगी। इस नक्षत्र को शुभ नक्षत्र माना जाता है। इसमें नान-दान और पूजन करना शुभ फलदायी होता है। इसके साथ ही इस दिन ब्रह्म योग और आनंदादि योग का निर्माण हो रहा है। इसे भी अनंत फलदायी माना जाता है।

मकर संक्रांति के दिन से शुभ कार्यों, जैसे विवाह संस्कार, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे कार्य आरंभ हो जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति से ही सूर्य देवता का दिन 6 माह के लिए आरम्भ हो जाता है। सूर्य के उत्तरायण की अवस्था को देवताओं का दिन कहा जाता है।

मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। वर्ष में 12 संक्रांतियां पड़ती हैं परंतु इनमें से मकर संक्रांति का विशेष महत्व है।

इस दिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ उत्तरायण होना शुरू हो जाता है इसीलिए इस दिन को उत्तरायण भी कहते हैं। इस दिन से देश में दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं तथा शीत ऋतु का प्रभाव कम होने लगता है।

Know the importance of Makar Sankranti

मकर संक्रांति का खगोलीय तथ्य

नवग्रहों में सूर्य ही एकमात्र ग्रह है जिसके आस-पास सभी ग्रह घूमते हैं। यही प्रकाश देने वाला पुंज है जो धरती पर जीवन प्रदान करता है। प्रति वर्ष 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है जिसे सामान्य भाषा में मकर संक्रांति कहते हैं।

यह एक खगोलीय घटना है जब सूर्य हर वर्ष धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है और हर बार यह समय लगभग 20 मिनट बढ़ जाता है। अतः 72 साल बाद एक दिन का अंतर पड़ जाता है।

15वीं शताब्दी के आसपास यह संक्रांति 10 जनवरी के आसपास पड़ती थी और अब यह 14 व 15 जनवरी को होने लगी है। लगभग 150 वर्ष के बाद 14 जनवरी की डेट आगे पीछे हो जाती है।

सन् 1863 में मकर संक्रांति 12 जनवरी को पड़ी थी। 2012 में सूर्य मकर राशि में 15 जनवरी को आया था। 2018 में 14 जनवरी और 2019 तथा 2020 में यह 15 जनवरी को पड़ी थी। गणना यह है कि 5000 वर्ष बाद मकर संक्रांति फरवरी के अंतिम सप्ताह में मनानी पड़ेगी।

जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चकर लगाती है, उस अवधि को सौर वर्ष कहते हैं। धरती का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना ‘क्रांति चक्र‘ कहलाता है। इस परिधि को 12 भागों में बांटकर 12 राशियां बनी हैं।

पृथ्वी का एक राशि से दूसरी में जाना ‘संक्रांति‘ कहलाता है। यह एक खगोलीय घटना है जो साल में 12 बार होती है। सूर्य एक स्थान पर ही खड़ा है, धरती चकर लगाती है। अतः जब पृथ्वी मकर राशि में प्रवेश करती है तो इसे मकर संक्रांति कहते हैं।

पौराणिक महत्व

आज के दिन का पौराणिक महत्व भी खूब है। सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने असुरों का संहार भी इसी दिन किया था। महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह ने भी प्राण त्यागने के लिए इस समय अर्थात सूर्य के उत्तरायण होने तक प्रतीक्षा की थी।

यशोदा जी ने इसी संक्रांति पर श्री कृष्ण को पुत्र रूप में प्राप्त करने का व्रत लिया था। इसके अलावा यही वह ऐतिहासिक एवं पौराणिक दिवस है जब गंगा नदी, भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए गंगासागर तक पहुंची थीं।

इस दिन पवित्र नदियाँ एवं तीर्थों में स्नान, दान, देव कार्य एवं मंगलकार्य करने से विशेष लाभ होता है। सूर्योदय के बाद खिचड़ी आदि बनाकर तिल के गुड़ वाले लड्डू प्रथम सूर्यनारायण को अर्पित करने चाहिएं, बाद में दानादि करना चाहिए। अपने नानेके जल में तिल डलने चाहिएं।

इस दिन ओम नमो भगवते सूर्याय नमः या ओम सूर्याय नमः मंत्रों का जाप करें। माघ माहात्म्य का पाठ भी कल्याणकारी है। सूर्य उपासना कल्याणकारी होती है।

सूर्य ज्योतिष में हड्डियों के कारक भी हैं अत: जिन्हें जोड़ों के दर्द सताते हैं या बार बार दुर्घटनाओं में फ्रैक्चर होते हैं उन्हें इस दिन सूर्य को जल अवश्य अर्पित करना चाहिए। पतंग उड़ाने की प्रथा भी इसीलिए बनाई गई ताकि खेल के बहाने, सूर्य की किरणों को शरीर में अधिक ग्रहण किया जा सके।

पंजाब केसरी से साभार

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