स्वतंत्रता दिवस: भारत की आज़ादी में इन आदिवासी समुदाय के योद्धाओं का भी है विशेष योगदान

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भारत में हर जगह आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। इस वर्ष (2022) भारत अपना 76वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई छोटे बड़े व्यक्तियों के योगदान से भारत आजाद हुआ है।

हर व्यक्ति ने अपने राज्य और क्षेत्र के स्तर पर कार्य किया और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई। भारत में कई जनजातियां निवास करती हैं और उनमें से कई महान लोगों ने स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। चलिए जानते हैं :-

भीमा नायक

भीमा नायक का जन्म मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में हुआ था। वर्ष 1857 में हुए अंबापानी युद्ध में भीमा नायक की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अंग्रेज जब भीमा नायक को सीधे नहीं पकड़ पाए तो उन्होंने उन्हें धोखे से पकड़ा।

तत्कालीन समय में जब तात्या टोपे निमाड़ आए, तब उनकी मुलाकात भीमा से हुई। इसी दौरान भीमा ने उन्हें नर्मदा नदी पार करने में सहयोग किया था। भीमा नायक को निमाड़ का रॉबिनहुड़ कहा जाता है।

टंट्या भील

इनका जन्म मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में 1842 में हुआ था। इनका वास्तविक नाम तंतिया भील है। इन्हें आदिवासी नायक, टंट्या मामा और ‘भारत के रॉबिनहुड‘ के नाम से भी जाना जाता है।

अपने जीवनकाल में टंट्या मामा ने आजादी के अनेक विद्रोहों में भाग लिया। 1857 की क्रांति में इन्होंने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने गोरिल्ला युद्ध पद्धति के जरिए अंग्रेजों से लोहा लिया। 4 दिसंबर 1889 को उन्हें फांसी दी गई।

बिरसा मुंडा

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 में हुआ था। बिरसा मुंडा ने मुंडा आदिवासियों के बीच अंग्रेजी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लोगों को जागरूक करना शुरू किया। मुंडा काफी समय तक पुलिस की पकड़ में नहीं आए, लेकिन एक गद्दार की वजह से गिरफ्तार हो गए।

इनके जन्मदिन 15 नवंबर को देश में ‘जनजातीय गौरव दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है। बिरसा मुंडा की समाधि रांची के कोकर में स्थित है। 9 जून 1900 को रांची जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। वे आदिवासियों के बीच भगवान की तरह पूजे जाते हैं और इन्हें भगवान बिरसा मुंडा कहा जाता है।

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