डाक भी अब मशीनों के हवाले

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एक जमाना था जब डाक सेवा के बारे में सोचते ही मन में पत्रों से भरे बोरों में से चिट्ठियों को हाथों से छांटने वाले डाक कर्मि तथा पत्रों को साइकिल पर घर-घर पहुंचाने वाले डाकियों की तस्वीर उभर आती थी। हालांकि, विज्ञान की तरक्की डाक विभाग के कामकाज में भी दिखाई देने लगी है। कई देशों में तो डाकघरों में रोबोटिक सिस्टम्स तक का इस्तेमाल खूब हो रहा है। पत्रों की छंटाई का काम अब चतुर मशीनें कर रही हैं और कुछ इंसान ही काम पर नजर रखने के लिए वहां होते हैं।

जर्मनी का डाक विभाग भी इनमें से एक है। फ्रैंकफर्ट स्थित ड्यूश पोस्ट्स (जर्मन डाक सेवा) के मुख्य डाकखाने में कन्वेयर बैल्ट्स की तथा मशीनों की आवाजें खूब सुनाई देती हैं। यहां लगभग सारा काम मशीनों को सौंप दिया गया है । पत्रों से लदी बड़ी-बड़ी क्रेट्स यांत्रिक पट्टियों पर एक से दूसरे स्थान तक पहुंचती हैं। जी.एस.ए. नामक यह मशीन सिस्टम प्रति घंटे में 40 हजार पत्रों की सही-सही छंटाई करता है।

बिग बॉस के नाम से मशहूर हो चुका जी.एस.ए. इतनाचतुर मशीनी सिस्टम है कि इसे पत्रों पर बारकोड्स की भी जरूरत नहीं पड़ती। मशीन बस पत्रों पर लिखे पतों को स्कैन करती है, फिर चाहे वे हाथों से ही क्यों न लिखे हों।

यह एक तरह से चेहरों की पहचान करने वाले सिस्टम जैसा है जिसके तहत एक पत्र की पहचान हो जाने के बाद सिस्टम उसे हर प्रोसैसिंग प्वाइंट पर स्वतः पहचान कर आगे पहुंचाता रहता है जब तक कि वह अपनी मंजिल पर न पहुंच जाए। इसके बाद स्कैन की सूचना अपने आप सिस्टम से डिलीट हो जाती है।

फ्रैंकफर्ट डिपो में 26 वर्ष से कार्यरत नादर अफशारी अब मेन हॉल के सामने पत्रों को क्रेट्स में डालने का काम करते हैं। वह बताते हैं, गत 20 वर्षों के दौरान हुआ सबसे बड़ा बदलाव यह आधुनिकीकरण ही हैं। पहले यहां 20 लोग काम करते थे, अब केवल 3 हैं।

नादर के करियर के दौरान इस डाकघर के मेन हॉल में नाटकीय बदलाव आ चुका है। अब हर चरण में मशीनों का प्रयोग हो रहा है।

डाकियों को सभी पत्र उसी क्रम में सहेजे हुए मिलते हैं जिसके हिसाब से उन्हें घरों तक पहुंचाना होता है। इससे सभी का वक्त, मेहनत और पैसा भी बचता है। डाक घर से पत्र निकलने पर उस पर लागत बढ़ने लगती है इसलिए पहले ही ज्यादा से ज्यादा तैयारी करने पर जोर दिया जाता है।

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जानिये क्यों और कैसे मोबाइल डाल रहा है आपके बच्चों पर बुरा असर

कभी बच्चों को बहलाने के लिए तो कभी उनकी ज़िद्द के कारण पेरेंट्स उन्हें अपना मोबाइल थमा देते हैं। आजकल स्मार्टफोन तो बच्चों का खिलौना हो गया है परंतु क्या आप जानते हैं कि मोबाइल आपके बच्चे के दिमाग को कमजोर बना सकता है तथा अनेक समस्याओं का कारण बन सकता है।

व्यवह्मर संबंधी समस्याएं

यदि आपका बच्चा बाहर जाकर खेलने की अपेक्षा मोबाइल पर गेम्स खेलने में बीज़ी रहता है तो उसे व्यवहार संबंधी समस्याएं होने की संभावना उन बच्चों से ज्यादा है जो बाहर जा कर अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलते हैं।

पल-पल मूड बदलना

आजकल ज्यादातर बच्चों को मूड स्विंग्स की समस्या रहती है, वे पल भर में खुश तो दूसरे ही पल चिड़चिड़े एवं मायूस हो जाते हैं। वास्तव में मूड स्विंग्स का एक बहुत बड़ा कारण मोबाइल का अधिक इस्तेमाल करना है।

कमजोर याददाश्त

मोबाइल फोन से निकलने वाले रेडिएशन के कारण दिमाग की सोचने की क्षमता प्रभावित होती है। अत: जो बच्चे ज़्यादा  देर तक मोबाइल पर बीज़ी रहते हैं उनकी याददाश्त कमजोर होने लगती हैं।

लर्निग डिसएबिलिटी

बच्चों के पढ़ने का तरीका भी बदल गया है। अब वे हमारी और आपकी तरह पढ़ने के लिए ज्यादा दिमाग खर्च नहीं करते क्योंकि इंटरनैट में एक क्लिक पर ही उन्हें सारी जानकारी मिल जाती है, इसलिए उन्हें कुछ भी याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती। इसका नतीजा यह है कि बच्चे नॉर्मल तरीके से पढ़ना भूल गए हैं।

आक्रामक व्यवहार

बच्चों के हाथ में मोबाइल होने के कारण उनका दिमाग भी हर समय उसी में लगा रहता है, कभी गेम्स खेलने, कभी सोशल साइट्स, तो कभी कुछ सर्च करने में यानी उनके दिमाग को आराम नहीं मिल पाता। दिमाग को शांति एवं सुकून न मिल पाने के कारण उनका व्यवहार आक्रामक हो जाता है।

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5 निराले समुद्री जीव, कोई सजने-संवरने में तो कोई दिमाग से है अव्वल

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि दुनिया भर में जीव-जंतुओं की क़रीब 87 लाख प्रजातियां हैं। हालांकि इनमें से अधिकतर की पहचान होना अभी भी बाकी है। हरेक जीव-जंतु अपने आप में अलग होता है तथा एक या दूसरी अनोखी विशेषता लिए हुए होता है।

पानी का संसार तो और भी विचित्र है। पानी के जीव संभवत: धरती के जीवों से अधिक आकर्षक और रंगीन होते हैं। इस पोस्ट के माध्यम से हम आपके लिए 5 रोचक और विचित्र जीवों का संकलन ले कर आये हैं जो अपने आप में बहुत निराले हैं।

डॉल्फिन

एक पूर्णतया विकसित डॉल्फिन एक दिन में 20 से 22 किलो मछलियां खा जाती है। डॉल्फिन का जीवनकाल 17 से 25 वर्ष तक होता है। खास बात यह है कि वे आईने में देख कर खुद को पहचान सकती हैं। सोनार तकनीक (ध्वनि तरंगों) की मदद से वे पानी में मौजूद चीजों की दूरी, उनके आकार-प्रकार के बारे में जान जाती हैं। डॉल्फिन आमतौर पर एक आंख खुली रख कर सोती हैं। डॉल्फिन को इंसान के बाद सबसे समझदार जीव समझा जाता है।

समुद्री ऊदबिलाव

समुद्री ऊदबिलाव दिन के करीब आधा वक्त अपने फर को संवारते हुए बिताते हैं। इन्हें वे अपनी उंगलियों की मदद से संवारते हैं। उनके मजबूत पंजे फर में कंघी सी करते हैं। इसके बाद वे अपने फर को मुलायम बनाने के लिए पानी में गोलगोल घूमते हैं। । आमतौर पर वे पीठ के बल ही सोते, आराम करते तथा तैरते हैं।

केकड़े

केकड़े की 6,700 से अधिक प्रजातियां हैं। जापानी मकड़ी केकड़े का फैलाव 12 फुट से ज्यादा हो सकता है और इसका वजन 19 किलो तक हो सकता है। केकड़ों की 10 टांगें होती हैं इसलिए उन्हें ‘डैकापोड्स’ (डैका- दस, पोडा- टांगें) के रूप में जाना जाता है। इनमें से टांगों की पहली जोड़ी पंजों के रूप में मौजूद होती है जिसकी मदद से वे अपने शिकार को पकड़ते तथा खाते हैं।

समुद्री कछुए

समुद्री कछुओं को खानाबदोश भी कहा जाता है, क्योंकि वे एक साल में करीब 16000 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। खासकर वे जेलिफ़िश ढूंढने के लिए यह सफर तय करते हैं। जापान में पैदा हुए लकड़हारे(Loggerhead) कछुए भोजन और परिपक्व होने के लिए लगभग 8,000 मील की दूरी पर बाजा कैलिफ़ोर्निया, मैक्सिको के समृद्ध पानी में चले जाते हैं। एक बार जब वे यौन परिपक्वता तक पहुँच जाते हैं, तो वे प्रजनन और घोंसला बनाने के लिए वापस जापान चले जाते हैं।

घोंघे

घोंघे का एक ही पैर होता है। वह पैर की आगे-पीछे होती रहने वाली मांसपेशियों की हरकत से एक तरह से जमीन पर घिसट कर चल पाता है। चलने में सरलता के लिए इसके मुंह के निचले हिस्से में स्थित एक ग्रंथि से लार निकलती रहती है। यह लार इसके पैर के नीचे से गुज़रती है जिससे घोंघा बेहद तीखी चीजों के ऊपर से भी बिना चोटिल हुए आसानी से गुज़र जाता है।

105 साल पुराने ऐतिहासिक रेल इंजन का होगा काया-कल्प

1913 में इंगलैंड में बने एक रेल इंजन को हाल ही में दरभंगा रेलवे स्टेशन पर लाया गया है, जिसका जल्द ही नवीनीकरण किया जाएगा। माना जाता है, कि एक चीनी मिल में माल ढुलाई के काम के लिए सर्वप्रथम इस भाप इंजन को लाया गया था। छोटी लाइन पर चलने वाला यह इंजन लोहाट शुगर मिल में जीर्ण-शीर्ण स्थिति में पड़ा हुआ था, जिसका स्वामित्व बिहार गन्ना उद्योग विभाग के पास था।

समस्तीपुर खंड के (डी.आर.एम. आर.के.) जैन बताते हैं कि, यह इंगलैंड में निर्मित भाप इंजन था| जो, एक चीनी मिल में बहुत ही ख़राब स्थिति में पड़ा हुआ था। कुछ विरासती कार्यकर्ताओं के अभियान के बाद उन्होंने (खंड के डी.आर.एम. आर.के. जैन) बिहार सरकार से इंजन को यहां लाने का आग्रह किया था, इससे उनको इस बात की इजाजत मिल गयी थी, और राज्य मंत्रि मंडल ने भी इस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी थी।

यह इंजन बहुत ऐतिहासिक है, क्योंकि यह इंजन चीनी मिल में उपयोग होने के लिए दरभंगा में लाया गया पहला रेल इंजन है।

अब इस इंजन की काफी मुरम्मत करनी पड़ेगी। क्योंकि, यह इंजन काफी पुराना हो चुका है। विशेषज्ञ इसे अच्छी अवस्था में लाने के लिए इस इंजन को पेंट करने का काम करेंगे, जिसके बाद इसे एक ऐतिहासिक रेल इंजन के रूप में प्रदर्शित किया जाएगा।

इस इंजन को छोटी रेल लाइन (नैरो गेज) ट्रैक के लिए बनाया गया था | इसे ‘कैप्टिव इंजन’ भी कहा जाता है| क्योंकि, इसे एक ही स्थान यानी चीनी मिल में इस्तेमाल के लिए रखा गया था।

रेलवे की इस विरासत को बचाने के लिए प्रयास करने वाले लोगों में शामिल रहे फोटोग्राफर तथा स्थानीय हैरिटेज एक्टिविस्ट संतोष कुमार के अनुसार, “सभी के प्रयास रंग लाए हैं। यह कदम दरभंगा में विरासत संरक्षण को प्रोत्साहित करेगा। जिले में एक और चीनी मिल में चार पुराने इंजन हैं, उन्हें भी बचाया जाना चाहिए, और प्रदर्शन के लिए अन्य स्टेशनों के सामने उन्हें रखा जाना चाहिए” | दरभंगा में रेल 1874 में आई थी, और तब दरभंगा राज के शाषकों की अपनी शाही ट्रेनें और सैलून होते थे।

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पत्नी की याद में बना दिया गिटार की Shape का जंगल

अपनी बेगम मुमताज़ महल की याद में ताजमहल बनवाकर शाहजहां ने इस दुनिया को मोहब्बत की एक अनोखी मिसाल दी थी। लेकिन इस युग में भी एक इंसान ने अपनी मोहब्बत के लिए जो बनाया, वो किसी ताजमहल से कम नहीं है। उस इंसान ने अपनी पत्नी को श्रद्धांजलि देने के रूप में गिटार के आकार के जंगल बनाने के लिए 7,000 पेड़ लगाए। जंगल तो आपने कई देखे होंगे, लेकिन क्या कभी आपने कोई जंगल Guitar के आकार में देखा है? अगर नहीं, तो आज हम आपको दिखा रहें हैं ऐसा ही एक जंगल जिसे हू-ब-हू Guitar की Shape में लगाया गया है।

इस गिटार के पीछे भी एक प्रेम कहानी है। ये हरे रंग का गिटार एक किसान पेड्रो मार्टिन यूरेटा ने बनाया है, जिनकी उम्र इस समय करीब 70 साल है। 1977 में पेड्रो को अपने जीवनसाथी से अलग होना पड़ा था।  उनकी 25 वर्षीय पत्नी ग्रेसिएला 5वीं बार गर्भवती हुईं थीं। उस दौरान मस्तिष्क की नस फट जाने के कारण उनकी मौत हो गई थी। अपनी पत्नी को श्रृद्धांजलि देने के लिए यूरेटा ने अपने खेत में ये डिजाइन बनाया था और तब से अब तक वो उन खेतों को सींचते आ रहे हैं।

28 साल के पेड्रो ने 17 साल की ग्रेसिएला से शादी की थी। उनके चार बच्चे थे। इस वन को लगाने की प्रेरणा पेड्रो को अपनी पत्नी ग्रेसीला से मिली थी। ग्रेसीला एक दिन विमान में पंपा के ऊपर से गुजर रही थीं तो उनकी नजर एक खेत पर पड़ी। जमीन का वो टूकड़ा देखने में दूध के किसी बर्तन की तरह लग रहा था।

ग्रेसीला ने घर आकर अपने पति से इस बारे बात की और कहा कि उन्हें भी अपनी जमीन पर कुछ बेहतर करना चाहिए और अपने खेत को एक विशाल Guitar का रूप देना चाहिए, क्योंकि ग्रेसीला को Guitar हमेशा से पसंद था। लेकिन अपने कामों में व्यस्त पेड्रो ने कभी उनपर ध्यान नहीं दिया। ग्रेसिला जब उनका साथ छोड़कर चली गईं, तब उन्होंने उनकी इच्छा पूरी करने का फैसला किया।

1979 में पेड्रो ने बिना किसी डिजाइनर की मदद से इस  प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया। पेड्रो और उनके चारों बच्चों ने इस मौदान में एक-एक पौधा अपने हाथों से लगाया। ये गिटार के आकार का जंगल 10.2 x12.3 वर्ग किलोमीटर में फैला है। पेड़ों को तब ये ध्यान में रखकर लगाया गया कि बड़े होने पर गिटार का आकार साफ और उभरता हुआ दिखाई दे। पेड्रो ने चारों बच्चों की देखभाल के साथ साथ इस जंगल का भी ख्याल रखा और आज जब वो पौधे, पेड़ बन चुके हैं, तो ये गिटार का जंगल आसमान से साफ दिखाई देता है।

वन को Guitar की बॉडी के 8 का आकार देने और Guitar का साउंड होल बनाने के लिए साइप्रस के पौधों का इस्तेमाल  किया गया, जबकि Guitar की 6 स्ट्रिंगस बनाने के लिए नीलगिरि के पौधे लगाए गए। पेड्रो ने अपनी पत्नी के लिए ये गिटार तो बना दिया लेकिन वो आज तक अपनी इस कृति को देख नहीं पाए।

क्योंकि इसे केवल आसमान से देखा जा सकता है और पेड्रो को आसमान में उड़ने से डर लगता है। यूरेटा ने यह स्वीकार किया कि जवानी के दिनों में एक दर्दनाक हादसे की वजह से वे जहाज में सफर करने से डरते हैं और खुद के द्वारा लगाए गए वन की उन्होंने केवल तस्वीरें ही देखी हैं। लेकिन आसमान से जिस किसी ने भी प्यार की इस निशानी को देखा है, उसका प्रेम पर भरोसा और भी मजबूत हुआ है।

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Husband made Guitar Shape forest in the memory of his wife

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इन 20 नियमों का पालन करके आप परीक्षा में ला सकते है अच्छे अंक

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“पढ़ाई कैसे करें” ? कोई भी इंसान पढाई करते समय अपने पढ़ने की क्षमता और पढ़ने के तरीके को विकसित करना चाहता है, हम यहाँ स्टूडेंट के लिये कुछ प्रभावशाली नियमों को बताने जा रहे हैं, जिन्हें अपनाकर निश्चित रूप से स्टूडेंटस अपने स्कोर को बढ़ा सकते है, और अपने अच्छे और सफल अकादमिक करियर की शुरुआत कर सकते हैं |

1 पढ़ते समय हमेशा सीधे बैठने की आदत डालनी चाहिए |

2 आत्मविश्वास, संकल्प शक्ति एवं एकाग्रतापूर्वक अध्ययन करना चाहिए।

3 प्रश्नों के उत्तरों को रट कर याद करने की कोशिश न करें, बल्कि इनको समझ कर पढ़ने का प्रयत्न करें।

4 दिमाग को पढ़ने के समय ताजगी भरा रखें। इसके लिए शौच क्रिया व्यवस्थित एवं नियमित होनी चाहिए।

5 भोजन को अच्छी तरह से चबा-चबा कर खाये। शुद्ध,सात्विक, संतुलित एवं संयमित भोजन ही करें।

6 फ्रिज़ की बहुत ही ठंडी वस्तुएं,चॉकलेट, टॉफी, चिप्स आदि स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं हैं, इनसे संयम करें।

7 हमेशा जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत डालिए।

8 हमेशा स्कूल के प्रारंभ होते ही पढ़ने का क्रम शुरू कर देना चाहिए, जिससे परीक्षा में कोई भी परेशानी न आये |

9  पढ़ने के लिए प्रात:काल का समय सबसे उत्तम है | इसलिए सुबह जल्दी उठकर अध्ययन करना चाहिए |

10 पढ़ी हुई चीजों को दोहराना न भूलें |

11 परीक्षा के कम से कम दो घंटे पहले पढ़ना बंद कर देना चाहिए, नहीं तो इससे दिमाग भ्रमित होने लगता है |

12 परीक्षा के पूर्व दो मिनट पहले लम्बी सांस लेकर फिर पेपर लिखना शुरू कर दीजिये |

13 पेपर को अच्छे ढंग से पढ़ कर धैर्य से उत्तर लिखना प्रारंभ करें |

14 परीक्षा देने के लिए जाते वक्त घर के मुख्य दुवार पर खड़े होकर देखिए कि आपका सांस किस नथुने से चल रहा है | जिससे चल रहा हो, पहले उसी ओर का पैर बाहर रखकर चलिए |

15 एक साथ लम्बे समय तक न पढ़ें। बीच-बीच में थोड़ा विश्राम भी करना जरूरी है |

16 पढ़ाई की तरह खेलकूद भी आवश्यक है, पर अधिक टी.वी. देखने से समय और दिमाग दोनों की बर्बादी होती है।

17 स्कूल में अपने प्राचार्य एवं शिक्षकों से अच्छे संबंध रखिए।

18 आलस्य विद्यार्थी जीवन का शत्रु है, अत: उससे आप दूर ही रहें।

19 अधिक जिद्दी स्वभाव आपके व्यक्तित्व को नष्ट कर देगा, अतः इससे बचिए।

20 हर काम नियमित एवं समय पर करने की आदत डालें और अपना कमरा साफ-सुथरा रखिए। (यदि विद्यार्थी इन नियमों का ध्यान रखेंगे तो वे अवश्य ही अच्छे अंक लेकर उत्तीर्ण होगा।)

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क्या आपने कभी देखें है समुद्र में तैरने वालें ऊंट

ऊंट को ‘ रेगिस्तान के जहाज़’ के नाम से विख्यात किया जाता हैं. क्योंकि, ऊंट रेगिस्तान की रेत पर बेहद आराम से चल सकते हैं, और वह पानी के बिना भी कई दिन आसानी से गुज़ार सकते हैं। ऊंटों की एक प्रजाति ‘खाराई’ ऐसी प्रजाति है, जो समुद्र में तैरने के लिए भी माहिर है।

‘खाराई’ ऊंट सप्ताह में एक बार समुद्र को तैर कर मैंग्रोव पेड़ों वाले टापू पर पहुंचते हैं, जहां ये ऊंट इन पेड़ों की पत्तियों को जम कर खाते हैं, और दो से तीन दिन आसानी से गुज़ार लेते  हैं।

ये ऊंट अपने रखवालों के साथ समुद्र में 10 किलोमीटर की दूरी को तैर कर गुजरात के कच्छ जिले में खाड़ी के साथ लगते टापुओं पर पहुंचते हैं। ये ऊंट गहरे पानी में तैर कर समुद्र पार करते हैं। खाराई ऊंट मैंग्रोव वनस्पति चरने के लिए काफी मेहनत करते हैं। उथले समुद्री पानी में उगने वाले मैंग्रोव के पेड़ ही इन ऊंटों के मुख्य आहार होते हैं।

इसी लिए खास हैं ये ऊंट

इन ऊंटों के बाल बहुत लम्बे होते हैं। जिनका इस्तेमाल स्टोल, बैग तथा दरियां बनाने में किया जा सकता है। ऐसे ही इन ऊंटों को पालने वाला एक स्थानीय इस्माइल जाट कहता है कि , “ये ऊंट बेहद अनूठे हैं, और इनका दूध पीने से डायबिटीज ठीक हो जाती है।”

खाराई ऊंट के दूध के भी अनेक लाभ हैं, और हाल के दिनों में तो इनके दूध की लोकप्रियता दुनिया भर में बहुत बढ़ती जा रही है। इसी के चलते खाराई ऊंट के दूध के दाम भी आसमान छूने लगे हैं।

समुद्र में इतना लंबा सफर तय करने की क्षमता रखने वाले ये ऊंट भारत में एकमात्र गुजरात के कच्छ जिले में ही पाए जाते हैं। कच्छ में मुंद्र के टुंडावांढ, अबसाडा के मोहाडी, लैयारी और भचाऊ के जंगी गांव में ये ऊंट देखे जा सकते हैं, और भावनगर के अलियाबेट में भी इनकी थोड़ी-बहुत संख्या पाई जाती है।

मानसून में तीन महीने टापू पर रहते हैं ये ऊंट

इन ऊंटों के चरने का इलाका मौसम के अनुसार बदलता रहता है | क्योंकि ये ऊंट अक्सर ही सफर करते रहते हैं, इन्हें पालने वाले इनके लिए कोई पक्का ठिकाना नहीं बनाते | मानसून के मौसम में तो इन ऊंटों को तीन महीने तक टापुओं पर ही छोड़ दिया जाता है | वहां खाई में बारिश का पानी जमा होने से इन ऊंटों के लिए पानी का बंदोबस्त भी हो जाता है| एक ऊंट को प्रतिदिन 20 से 40 लीटर पानी की जरूरत होती है | गर्मियों तथा सर्दियों के दिनों में टापुओं पर ये ऊंट एक साथ 3 दिन से ज्यादा नहीं रहते |

घटती संख्या

गुजरात के 6 तटवर्ती जिलों में इन ऊंटों की संख्या कम होकर 5 हज़ार रह गई है | इन ऊंटों को दो अलग समुदाय पालते हैं- फकीरानी जाट जो इन्हें सम्भालते हैं, और राबरी जो इनके मालिक होते हैं |

इन ऊंटों को पलने वालों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है | मैंग्रोव के पेड़ भी कम होते जा रहे हैं , जिससे इन ऊंटों के पारम्परिक चराई मार्ग खत्म हो रहे हैं | इसके अलावा इन ऊंटों की कम हो रही बिक्री और इनके दूध का रख-रखाव करना भी बहुत मुश्किल है |

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अनोखी दुकान, जहाँ मिलती है 100 से अधिक किस्म की चाय

अधिकतर लोगों के लिए यह चेन्नई के दक्षिण रेलवे हैडक्वार्टर्स के आगे मिंट स्ट्रीट पर महज एक स्टाल है परंतु यहां रोज़ाना आने वाले यात्रियों के लिए यह जगह ‘मस्ट’ है।वे यहां आकर टी पीते हैं। इस स्टाल का मालिक चाय की विभिन्न किस्में तैयार करता है जिनमें से कुछ में वह जड़ी-बूटियों का प्रयोग भी करता है।

चाय की दुकान का मालिक के. राजीव चाय की 100 से अधिक किस्में तैयार करता है जिनमें से कुछ तो स्वास्थ्य को लाभ देने वाली भी हैं। उसके पास 2 हज़ार लोग नियमित रूप से आकर चाय का आनंद उठाते हैं। वह आम ,नींबू, अदरक, ग्रीन या हनी टी के अतिरिक्त वह हर्बल टी के 90 मिश्रण नियमित तौर पर बेचता है। केरल निवासी राजीव ने यह टी स्टाल चार वर्ष पहले शुरू किया था। जब उसके दिमाग में अपने ग्राहकों को चाय की वैरायटी देने का विचार आया तो उसने समय नहीं गंवाया। सबसे पहले उसने विभिन्न किस्मों वाली इलायची तथा अदरक वाली चाय ग्राहकों को पेश की।

वह कहता है, “मेरा उद्देश्य ग्राहकों के लिए इसे आसान बनाना है। स्वाद में परिवर्तन ग्राहकों के लिए बहुत अलग बात है। उन्हें यह एहसास होता है कि आम टी बैग्स की निर्माण प्रक्रिया से चाय की ऐसी किस्में प्राप्त की जा सकतीं है। राजीव बताता है कि वह चाय की तैयारी के दौरान तथा इसे स्टोर करने का पूरा ध्यान रखता है ताकि ग्राहकों को उनका अपेक्षित स्वाद मिले। वह कहता है, जब मैं नया था तो मैं सब कुछ बुजुर्गों की सलाह और किताबें पढ़कर किया करता था। मैं रैसिपी को अच्छे से फालो करता था। अब मैं सोचता हूं कि मैं गलत नहीं हो सकता। वह केरल के वायनाड तथा मलप्पुरम के मध्य स्थित दुकान पर पांडीक्कड में नियमित तौर पर जाता है ताकि वहां से वह शहद, सफेद मिर्ची तथा इलायची ला सके। ये सब चीजें वहां से बहुत अच्छी क्वालिटी की मिलती हैं। वह सूखा अदरक, लौंग, तुलसी तथा पुदीना स्थानीय बाज़ार  से खरीदता है।

वह बताता है शहद वाली ग्रीन टी 25 दिन तक पीने से कोलेस्ट्राल कम होता है। हनी, लैमन टी उन लोगों के लिए लाभदायक है जो नाइट शिफ्ट में काम करते हैं क्योंकि यह पाचन में सहायक होती है । यदि कोई हर्बल टी नहीं पीना चाहता तो उसके लिए चाकलेट टी उपलब्ध है। उसके अनुसार हर्बल टी में औषधीय गुण होते हैं। इससे जुक़ाम  को कम करने में सहायता मिलती है। पाचन तंत्र बढ़िया होता है और कई तरह के संक्रमण भी इस चाय से दूर होते हैं। उदाहरण के लिए उल्टी आने पर पुदीने की चाय पीने से लाभ मिलता है। गाल ब्लैडर में पाचक रस को उत्तेजित करके पुदीना पाचन प्रणाली की फैट को कम करता है और इस तरह उल्टी की संभावना कम होती है। इसके अतिरिक्त हर्बल टी का प्रयोग खांसी में भी लाभदायक होता है।

राजीव की अन्य विशेष आफर्स में एक तरह की काढ़ा चाय भी शामिल है जिसमें वृक्ष की छाल-औषधीय जड़ी-बूटियां तथा सुगंध रहित बीजों का प्रयोग किया जाता है। उसके अनुसार अदरक तथा लौंग की चाय की तासीर गर्म होती है, जबकि पुदीने, तुलसी और गुलाब के पत्तों वाली चाय की तासीर ठंडी होती है। उसके अनुसार हर्बल टी की तैयार कोई त्वरित प्रक्रिया नहीं है। इसके के लिए प्रयोग की जाने वाली जड़ी बूटियों की जानकारी तथा चाय बनाने का अभ्यास जरूरी है।

उसके अनुसार उसके कई ग्राहकों की मैडीकल बैकग्राऊंड होने के चलते उसने उनसे बहुत कुछ सीखा। उन्होंने उसे सिखाया हैं कि किस तरह साफ-सुथरे ढंग से चाय परोसी जाए। वह अपने गिलासों को अच्छी तरह से धोता है और इस बात को सुनिश्चित बनाता है कि उसके स्टाल के चलते वातावरण प्रदूषित न हो।

दक्षिण रेलवे हैडक्वार्टर्स के दो हजार से अधिक कर्मचारी उसके ग्राहक हैं। एक सरकारी अस्पताल में काम करने वाली नर्से उसकी दुकान पर चाय पीने के लिए एक किलोमीटर पैदल चल कर आती हैं। कई डाक्टर्स भी उसके ग्राहकों में शामिल हैं।

वह अन्य शहरों में भी अपने टी स्टाल की शाखाएं खोलने का इच्छुक है। वह बताता है,कई होटलों ने मुझे बुलावा भेजा था। मुझे उस वक्त बहुत तसल्ली मिलती है जब मैं पारंपरिक ढंग से अपनी दुकान पर ग्राहकों को चाय परोसता हूं। वह जल्द ही जर्मन तथा जापानी टी परोसने की योजना भी बना रहा है।

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एंटीबायोटिक्स जितना कम उतना बेहतर

एंटीबायोटिक्स जितना कम उतना बेहतर

एंटीबायोटिक ड्रग्स के मामले में खूब सोच-विचार की जरूरत होती है। कई अध्ययन हमें बताते हैं कि हल्के संक्रमण, विशेषकर गले के रोगी एंटीबायोटिक्स के बगैर भी ठीक हो जाते हैं। भारत के अधिकतर हिस्सों में रोगी इस आधार पर अपनी पसंद से एंटीबायोटिक्स खरीदते हैं कि पूर्व में कौन-सी एंटीबायोटिक दवा से उन्हें आराम आया था। ऐसा माना जाता है की एंटीबायोटिक का जितना कम इस्तेमाल करेंगे उतना बेहतर होगा।

अथवा वे ‘सैरोगेट डॉक्टर’ यानी कैमिस्ट से सलाह लेते हैं। डॉक्टर भी तुरंत फोन पर सलाह देते हैं ताकि उन्हें रोगियों से न निपटना पड़े। इस संबंध में कोई आदर्श मापदंड नहीं है कि व्यक्ति को एंटीबायोटिक का सेवन कितनी देर करना चाहिए परंतु डॉक्टरों को लगता है कि इन्हें 3 से 5 दिन लेना चाहिए या जब तक कि इनफ़ेक्शन पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाता है। लेकिन क्या यह सही है?

कितनी में देर लें ‘एंटीबायोटिक्स’

कई डॉक्टर जोर देते हैं कि रोगी कई दिनों के एंटीबायोटिक कोर्स को पूरा करें। जर्नल ऑफ द अमेरिकन मैडीकल एसोसिएशन में प्रकाशित स्पैलबर्ग के एक लेख के अनुसार एंटीबायोटिक्स सेवन का नया मंत्र ‘जितना कम, उतना बेहतर होना चाहिए। एंटीबायोटिक्स के छोटे कोर्स बैक्टीरिया में प्रतिरोधी क्षमता पैदा होने से रोकते हैं। वास्तव में लम्बे कोर्स से शरीर में मौजूद साधारण सूक्ष्मजीव भी एंटीबायोटिक्स के प्रतिरोधी बन सकते हैं और वे भी शरीर पर हमले शुरू कर सकते हैं।

‘साइडल’ बनाम ‘स्टेटिक’

एंटीबायोटिक्स दो तरह के होते हैं। एक वे जो बैक्टीरिया को मारते हैं उन्हें ‘साइडल एंटीबायोटिक्स’ कहते हैं, और दूसरे जो बैक्टीरिया को मारे बिना फैलने से रोकते हैं और उन्हें ‘स्टेटिक एंटीबायोटिक्स’ कहते हैं। यह आम धारणा है कि ‘साइडल एंटीबायोटिक्स’ बेहतर होते हैं परन्तु चिकित्सकीय अध्ययन हमें कुछ और ही बताते हैं। 128 शोधकर्ताओं का एक अध्ययन ‘स्टेटिक एंटीबायोटिक्स’ पर ‘साइडल एंटीबायोटिक्स’ की श्रेष्ठता साबित करने में नाकाम रहा है।

डी.एन.ए. से चिपके रहते हैं एंटीबायोटिक्स

एंटीबायोटिक्स के तत्व हमारी कोशिकाओं के डी.एन.ए. के साथ चिपक जाते हैं और लम्बे वक्त तक वहां रहते हैं। इसके दीर्घकालीन दुष्प्रभावों पर विस्तार से विश्लेषण अभी होना है। जोसफ किंग तथा उनके सहयोगियों का शुरूआती शोध दर्शाता है कि कोशिकाओं में इसी तरह चिपकने वाली आम इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक’ फ्लूओनोक्विनोल्यूज’ कई अन्य बीमारियों की वजह हो सकती है जिनमें ‘गल्फ वार सिंड्रोम’ भी एक हो सकती है।

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