75 का हुआ हावड़ा ब्रिज

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‘ गेटवे ऑफ़ कोलकाता’ के नाम से मशहूर हावड़ा ब्रिज को रबिन्द्र नाथ टैगोर के नाम रबिन्द्र सेतु कहा जाता है. देश विदेश के पर्यटकों के अलावा यह मशहूर फिल्मकारों को भी लुभाता रहा है. हाल ही में ब्रिज के 75 साल पूरे होने के मौके पर उसे रंग बिरंगी रौशनी से सजाया गया.वर्ष 1937 से 1942 के बीच बने इस ब्रिज को आम लगों के लिए 3 फरवरी, 1943 को खोला गया था लेकिन जापानी सेना की बमबारी के डर से उस दिन कोई बड़ा समारोह आयोजित नहीं किया गया था.

14 जून,1965 को इस ब्रिज का नाम बदलकर रबिन्द्र सेतु कर दिया गया था. 18वीं सदी में हुगली नदी पार करने के लिए कोई ब्रिज नहीं था. तब नावें ही नदी पार करने का एक मात्र जरिया था. बंगाल सरकार ने 1862 में ईस्ट इंडिया रेलवे कम्पनी इंजिनियर जार्ज टर्नबुल को हुगली नदी पर ब्रिज बनाने की संभावनाओं को पता लगाने का काम सौंपा था. वर्ष 1874 में 22 लाख रूपए की लागत से नदी पर पीपे का पुल बनाया गया जिसकी लम्बाई 1528 फुट और चौड़ाई 62 फुट थी.

वर्ष 1906 में हावड़ा स्टेशन बनने के बाद धीरे धीरे ट्रैफिक और लोगों की आवाजाही बढने पर इस पुल की जगह एक फ्लोटिंग ब्रिज बनाने का फ़ैसला हुआ लेकिन तब तक पहला विश्वयुद्ध शुरू हो गया था. नतीजतन काम ठप्प हो गया. वर्ष 1922 में न्यू हावड़ा ब्रिज कमीशन का गठन करने के कुछ वर्ष बाद इसके लिए निविदाएँ आमंत्रित की गई. बाद में इसके निर्माण का ज़िम्मा ब्रेथवेट, बर्न एंड जोसेफ कंस्ट्रक्शन कम्पनी को सौंपा गया.

इस कैंटरलीवर पुल को बनाने में 26 हज़ार 500 टन स्टील का इस्तेमाल किया गया. इसमें से 23 हजार 500 टन स्टील की सप्लाई टाटा स्टील ने की थी. बन कर तैयार होने के बाद यह दुनिया में अपनी तरह का तीसरा सबसे लंबा पुल था. पूरा पुल महज नदी के दोनों किनारों पर बने 280 फुट ऊँचे दो पायों पर टिका है. 2150 फुट लंबा यह पुल इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना है. इसके दोनों पायों के बीच की दूरी 1500 फुट है.

इसकी खासियत है कि इसके निर्माण में स्टील की प्लेटों को जोड़ने के लिए नट बोल्ट की बजाय धातु की बनी किलों यानी रिवेट्स का इस्तेमाल किया गया.अब इससे रोजाना लगभग सवा लाख वाहन और 5 लाख से ज्यादा पैदल यात्री गुजरते है. ब्रिज बनने के बाद इस पर पहली बार एक ट्रेन गुजरी थी परन्तु वर्ष 1993 में ट्रैफिक बड जाने के बाद  ट्रेनों की आवाजाही बंद कर दी गई.द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापानी सेना ने इसे नष्ट करने के लिए भारी बमबारी की लेकिन संयोग से इसे कोई नुक्सान नही पहुंचा.

कोल्कता पोर्ट ट्रस्ट इस पुल कि देखरेख करने के साथ ही नियमित रूप से मुरम्मत भी करता है. इसके अलावा समय समय पर ब्रिज की स्थिति का पता लगाने के लिए विभिन्न शोध संस्थानों की ओर से अध्ययन भी कराए जाते है.

 

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