ये है पाकिस्तानी दंगल गर्ल्स

सिंगापुर में आयोजित ओशिनिया पैसिफिक पॉवरलिफ्टिंग चैंपियनशिपस में पाकिस्तानी दंगल गर्ल्स ने 57 किलोग्राम वर्ग की स्कवैट, बैंच प्रेस, डैड लिफ्ट तथा एग्रीगेट वेट श्रेणियों में चार स्वर्ण पदक जीते. स्वर्ण पदक जीतने वाली सनेहा गफूर कहती है, “वहाँ मुकाबला बहुत कठिन था. दूसरी लड़कियां बहुत अच्छी लग रही थी. हमें खुद से ज्यादा अपेक्षाएं नहीं थी. मेरा मुकाबला सिंगापुर की एक लड़की से था. मैंने पहले ही प्रयास में सफलतापूर्वक वजन उठा कर उसे हरा दिया. वह रो पड़ी क्योंकि मैंने उसका स्वर्ण पदक छीन लिया था.”

गत वर्ष सानिहा ने लाहौर में आयोजित तीसरी नेशनल वुमेन्स वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में 9 राष्ट्रीय कीर्तिमान भी स्थापित किए. सानेहा वेटलिफ्टिंग चैंपियंस के परिवार से है. उनके पिता अब्दुल गफूर ने 1970 के कामनवेल्थ खेलों में रजत पदक जीता था. उनके भाई इशितयाक तथा अब्दुल्ला भी वेटलिफ्टर है जिन्होंने अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते थे. उसके चाचा मंजूर 1976 के मोंट्रियल ओलंपिक्स में हिस्सा लिया था.

गत वर्ष सिंगापुर में केवल सानेहा ने ही नहीं, बहनों ट्विंकल तथा साइबिल सोहेल ने भी 47 तथा 72 किलोग्राम वर्गों में 4 पदक अपने नाम किए. उन दोनों की दो अन्य बहनें 23 वर्षीय मरियम (57 किलो वर्ग) तथा 14 वर्षीय वेरोनिका (44 किलो वर्ग) भी पॉवरलिफ्टिंग की ट्रेनिंग ले रही है.

ट्विंकल बताती है,”हमारे घर में सभी खेलों से जुड़े है.” हमारा एक भाई नेशनल साइकिलिंग चैंपियन है. हमारे माता पिता ने हमेशा हमारा होसला बढाया. हमारी सफलता का श्रेय हमारे पिता को जाता है. उनके लिए भी यह आसान नहीं था. जब हम बहनों ने पॉवरलिफ्टिंग शुरू की तो हमारे दादा ने इसका विरोध किया कि क्यों परिवार की लड़कियां वजन उठाने का खेल खेल रही है. लोगों के तानों के बावजूद पिता जी ने हमारा खेलना रुकने नहीं दिया. लोगों की धारना तब बदली जब हम पदक  जीत कर देश लौटीं और अब उन्हें हम पर गर्व है.

ट्विंकल कहती है “मैं तो लोगों को कहती हूँ कि dangal बनी ही हम पर है”. गत वर्ष मेलबोर्न में इंटरनेशनल पॉवरलिफ्टिंग टूर्नामेंट में रजत पदक जीतने वाली मरियम नसीम पेशावर में जन्मी और बड़ी हुई है परंतु इन दिनों वह ऑस्ट्रेलिया रह रही है.

आधिकारिक स्तर में पकिस्तान में अभी वीमेन वेटलिफ्टिंग तथा पॉवरलिफ्टिंग एक नया खेल है. 2013 में ही सरकार ने वुमेन वेट डिवीज़न की सथापना की थी. वहां इस खेल की इतने देर से शुरुआत किए जाने की वजह थी कि पहले अंतराष्ट्रीय मुकाबलों में महिलाओं को इस्लामिक मान्य पहनावे में हिस्सा लेने की स्वीकृत नहीं थी.

इंटरनेशनल वेटलिफ्टिंग फेडरेशन ने 2011 में महिला खिलाडियों की ड्रेस संबंधी नियमों में बदलाव करते हुए उन्हें ‘वन पीस फुल बॉडी टाइटफिटिंग यूनीटार्ड’ पहनने की इजाजत दी.यह बदलाव अमेरिका में एटलांटा की pakistani- american वेटलिफ्टर कुलसूम अब्दुल्ला को 2010 में हिजाब पहनने की वजह से american ओपन टूर्नामेंट ले लिए क्वालिफाइड करने से रोक दिया था. जजों को लगा था कि हिजाब की वजह से उसे अनुचित लाभ मिल सकता है क्यूंकि वे इस बात की पुष्टि नही कर सकेंगे कि वजन उठाने पर उसकी बाजुएँ पूरी तरह सीधी हुई है या नइ.

इसके बाद 2011 में कुलसूम ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में पकिस्तान की और से हिस्सा लिया था. दोहरी नागरिकता की वजह से वह पाकिस्तान में न रहते हुए भी उसकी और से अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा ले सकी परन्तु अक्टूबर 2015 में जाकर पकिस्तान की पहली महिला पॉवरलिफ्टिंग टीम  ने किसी अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया.

यह ओमान के मस्कट में आयोजित एशियन पॉवरलिफ्टिंग बैंच प्रेस चैंपियनशिप थी जहां 19 वर्षीय ट्विंकल सोहेल अंतराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीतने वाली प्रथम पाक महिला पॉवरलिफ्टर बनी. वहां सोनिया अजमत 63 किलोग्राम तथा शाजिया भट्ट ने 84 किलोग्राम वर्ग में भी स्वर्ण पदक अपने नाम किए. उनकी सफलता देखकर कर हर कोई हैरान था कि पाक महिलाएं पॉवरलिफ्टर बन ही नही सकती, पदक भी जीत सकती है.

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