हर साल नवरात्रि आते ही घर में एक अलग ही माहौल बन जाता है। सुबह-सुबह माँ की आरती की आवाज़, रसोई में कुट्टू के आटे की ख़ुशबू और मन में एक सवाल: “इस बार नवरात्रि व्रत ठीक से रख पाऊँगी या नहीं?”
अगर आप पहली बार नवरात्रि व्रत रख रहे हैं, या हर साल रखते हैं पर विधि को लेकर मन में थोड़ी उलझन रहती है, तो यह लेख आपके लिए है। इसमें बिना कठिन शब्दों के व्रत से उद्यापन तक की पूरी बात है। इस साल नवरात्रि 11 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2026 तक है।

व्रत रखने का असली मतलब क्या है
व्रत सिर्फ़ भूखे रहने का नाम नहीं है। इसका असली भाव है मन, शरीर और खान-पान को शुद्ध रखकर माँ दुर्गा को याद करना। इसलिए अगर कोई पूरा निर्जल व्रत नहीं रख सकता, तो भी श्रद्धा से रखा गया फलाहारी व्रत उतना ही मान्य है।
आप किस तरह का व्रत रख सकते हैं
अपनी सेहत और सुविधा के हिसाब से इनमें से कोई भी तरीका चुन सकते हैं:
| व्रत का तरीका | क्या होता है | किसके लिए ठीक है |
|---|---|---|
| पूर्ण उपवास | दिन भर अन्न-जल या सिर्फ़ जल पर रहना | जो पहले से अभ्यस्त हों और स्वस्थ हों |
| फलाहारी व्रत | फल, दूध, मखाना और व्रत वाले आटे से बना भोजन | ज़्यादातर लोगों के लिए सबसे आसान |
| एक समय भोजन | दिन में एक बार व्रत वाला सात्विक खाना | कामकाजी लोगों और बुज़ुर्गों के लिए |
| पहले और आख़िरी दिन का व्रत | सिर्फ़ पहले (प्रतिपदा) और आख़िरी दिन व्रत | जो नौ दिन नहीं रख सकते |
ज़रूरी बात: अगर आप गर्भवती हैं, डायबिटीज़ या ब्लड प्रेशर जैसी कोई समस्या है, या बहुत बुज़ुर्ग हैं, तो व्रत शुरू करने से पहले डॉक्टर से पूछ लें। माँ की भक्ति सेहत की क़ीमत पर नहीं होती।
व्रत की शुरुआत: पहले दिन क्या करें
1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। साफ़ कपड़े पहनें। कई लोग इन दिनों लाल, पीला या उस दिन का शुभ रंग पहनते हैं।
2. पूजा स्थान को साफ़ करें। घर के मंदिर या किसी साफ़-सुथरी जगह पर चौकी रखें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएँ। माँ दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
3. संकल्प लें। हाथ में थोड़ा जल, अक्षत (चावल) और फूल लेकर मन में कहें कि आप किस नियम से और कितने दिन का व्रत रखेंगे। यह बिल्कुल सरल भाषा में हो सकता है, जैसे “माँ, मैं नौ दिन श्रद्धा से व्रत रखूँगा/रखूँगी, मुझे शक्ति देना।”
4. कलश स्थापना (घटस्थापना) करें। यह नवरात्रि की सबसे अहम रस्म है। इसकी सामग्री यह है:
| सामग्री | कैसे इस्तेमाल करें |
|---|---|
| मिट्टी का पात्र और जौ | मिट्टी में जौ बोएँ, ये नौ दिन में हरे अंकुर बनते हैं |
| कलश (तांबा या मिट्टी) | जल भरकर पात्र के पास रखें |
| आम के पत्ते और नारियल | कलश के ऊपर पत्ते रखकर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें |
| अखंड ज्योत (वैकल्पिक) | नौ दिन जलने वाला दीपक, यदि देखभाल कर सकें |
| रोली, चावल, फूल, धूप, दीप | रोज़ की पूजा के लिए |
घटस्थापना का शुभ समय हर साल पंचांग से तय होता है, इसलिए अपने स्थानीय पंडित जी से या किसी भरोसेमंद पंचांग से समय ज़रूर देख लें।
रोज़ की पूजा कैसे करें
पूजा लंबी या जटिल नहीं होनी चाहिए। रोज़ का सीधा-सा क्रम यह है:
- सुबह स्नान के बाद दीपक जलाएँ।
- उस दिन की देवी को रोली, चावल और फूल चढ़ाएँ।
- दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती या अपनी श्रद्धा के अनुसार माँ के मंत्र का पाठ करें।
- आरती करें और भोग लगाएँ।
- शाम को फिर दीपक जलाकर आरती करें।
जो लोग सप्तशती नहीं पढ़ पाते, वे सिर्फ़ “ॐ दुं दुर्गायै नमः” का जाप भी कर सकते हैं। मन से किया गया छोटा पाठ भी पूरा माना जाता है।
नौ दिनों में किस देवी की पूजा होती है
| दिन | देवी | तारीख (2026) |
|---|---|---|
| 1 | शैलपुत्री | 11 अक्टूबर |
| 2 | ब्रह्मचारिणी | 12 अक्टूबर |
| 3 | चंद्रघंटा | 13 अक्टूबर |
| 4 | कूष्मांडा | 14 अक्टूबर |
| 5 | स्कंदमाता | 15 अक्टूबर |
| 6 | कात्यायनी | 16 अक्टूबर |
| 7 | कालरात्रि | 17 अक्टूबर |
| 8 | महागौरी | 18 अक्टूबर |
| 9 | सिद्धिदात्री | 19 अक्टूबर |
व्रत में क्या खाएँ और क्या नहीं
यहाँ अक्सर सबसे ज़्यादा भ्रम होता है। नीचे की तालिका से सब साफ़ हो जाएगा:
| खा सकते हैं | न खाएँ |
|---|---|
| कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, राजगिरा | गेहूँ, चावल, दालें और आम अनाज |
| साबूदाना, समा के चावल (साँवा) | प्याज़ और लहसुन |
| सेंधा नमक | साधारण नमक |
| आलू, लौकी, कद्दू, अरबी, शकरकंद | मांस, मछली, अंडा |
| सभी फल, मखाना, मेवे | शराब और तंबाकू |
| दूध, दही, पनीर, घी | बाहर का पैकेट वाला प्रोसेस्ड खाना |
एक छोटी सलाह: व्रत में सिर्फ़ तला हुआ खाना न खाएँ। दही, फल और नारियल पानी बीच-बीच में लेते रहें, ताकि पानी की कमी और कमज़ोरी न हो। पानी भरपूर पिएँ।
व्रत के दौरान ये नियम भी निभाएँ
व्रत सिर्फ़ खाने तक सीमित नहीं है। इन बातों का भी ध्यान रखा जाता है:
- मन में क्रोध, झगड़ा और बुरे विचार न आने दें।
- सादा और संयमित जीवन जिएँ, ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- घर और पूजा स्थान साफ़ रखें।
- झूठ न बोलें और किसी का अपमान न करें।
- ज़रूरतमंद को खाना या दान दें।
कई परिवारों में इन दिनों चमड़े का सामान न पहनने और नाखून-बाल न काटने की भी परंपरा है। यह हर घर और इलाके में थोड़ी अलग हो सकती है, इसलिए अपने परिवार की परंपरा के अनुसार चलें।
उद्यापन क्या होता है और कब करें
उद्यापन का मतलब है व्रत का विधिवत समापन। जैसे परीक्षा पूरी होने पर कोई “धन्यवाद” कहता है, वैसे ही माँ का आभार मानकर व्रत पूरा किया जाता है।
परंपरा के अनुसार उद्यापन अष्टमी या नवमी को किया जाता है। यह आपके घर की परंपरा पर निर्भर करता है कि आप किस दिन करते हैं। 2026 में अष्टमी 18 अक्टूबर और नवमी 19 अक्टूबर को है। फिर दशमी (20 अक्टूबर) को व्रत का पारण होता है।
उद्यापन की विधि
1. सुबह की पूजा और हवन। सुबह स्नान के बाद माँ की पूजा करें। जो लोग हवन कर सकते हैं, वे हवन कुंड में आम की लकड़ी, घी, जौ, तिल और हवन सामग्री से आहुति दें। हवन न कर पाएँ तो घी का दीपक जलाकर विशेष आरती भी की जा सकती है।
2. कन्या पूजन। यह उद्यापन का सबसे ख़ास हिस्सा है।
| काम | कैसे करें |
|---|---|
| कन्याओं को बुलाएँ | 9 छोटी कन्याएँ (लगभग 2 से 10 साल की) और एक छोटा बालक, जिसे “लंगूर” या बटुक भैरव का रूप माना जाता है |
| पैर धोएँ | आदर से साफ़ जल से उनके पैर धोएँ और आसन पर बिठाएँ |
| तिलक और चुनरी | माथे पर रोली का तिलक लगाएँ, कलाई पर मौली बाँधें और चुनरी दें |
| भोजन परोसें | आमतौर पर पूरी, काले चने और सूजी का हलवा |
| दक्षिणा और उपहार | अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार पैसे, फल, चूड़ियाँ, पेंसिल-कॉपी या कोई छोटा उपहार |
| आशीर्वाद लें | उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें और प्रेम से विदा करें |
कन्याओं को देवी का रूप मानकर पूजा जाता है, इसलिए यहाँ दिखावे से ज़्यादा सम्मान और स्नेह मायने रखता है। भोजन ताज़ा और सात्विक रखें।
3. बड़ों का आशीर्वाद और दान। घर के बुज़ुर्गों का आशीर्वाद लें। साथ ही ज़रूरतमंदों को अन्न, कपड़े या अपनी क्षमता के अनुसार दान दें।
4. पारण (व्रत खोलना)। दशमी के दिन, यानी दशहरे पर, पूजा करके व्रत खोलें। पारण हल्के सात्विक भोजन से करें, क्योंकि नौ दिन के बाद शरीर को अचानक भारी खाना पचाने में दिक्कत हो सकती है।
5. जौ और कलश का विसर्जन। जौ के अंकुर, जो नौ दिन में उग चुके होते हैं, उन्हें प्रसाद की तरह परिवार में बाँट सकते हैं या घर में तिजोरी या पूजा स्थान में रख सकते हैं। कलश के जल को घर में छिड़कें या किसी पौधे में डाल दें। पूजा सामग्री को कूड़े में न फेंकें, बल्कि बहते जल में या पेड़ के नीचे श्रद्धा से विसर्जित करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
| सवाल | जवाब |
|---|---|
| अगर बीच में व्रत टूट जाए तो? | घबराएँ नहीं। माँ से क्षमा माँगें और अगले दिन से नियम से जारी रखें। भाव सबसे ज़रूरी है। |
| क्या पीरियड्स में व्रत रख सकते हैं? | इस पर अलग-अलग परिवारों की अलग मान्यताएँ हैं। आप व्रत और मन में पाठ-स्मरण जारी रख सकती हैं। पूजा-स्थल से जुड़ी बातों के लिए अपने घर की परंपरा या पंडित जी से पूछ लें। |
| 9 कन्याएँ न मिलें तो? | जितनी मिलें उतनी को आदर से भोजन कराएँ, या मंदिर में अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन-दान दें। |
| क्या नौकरी करने वाले व्रत रख सकते हैं? | हाँ, फलाहारी या एक समय भोजन वाला व्रत ऑफ़िस के साथ आसानी से निभ जाता है। |
आख़िर में एक बात
नवरात्रि का व्रत “सब कुछ परफ़ेक्ट करने” की परीक्षा नहीं है। कभी सामग्री कम पड़ सकती है, कभी समय चूक सकता है, और यह ठीक है। माँ दुर्गा आपके साफ़ मन और सच्ची श्रद्धा को देखती हैं, सामग्री की लंबी सूची को नहीं।
आप सभी का व्रत सफल हो और माँ का आशीर्वाद आपके घर में सुख, शांति और समृद्धि लाए। जय माता दी!
नोट: पूजा के शुभ मुहूर्त और कुछ रीति-रिवाज़ क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं, इसलिए अपने पंडित जी या स्थानीय पंचांग से समय ज़रूर मिला लें।

