सुपरहिट चुनावी नारे, जिन्होंने बदल दी सरकारें

देश में आम चुनाव का बिगुल बज चुका है और भाजपा ‘अब की बार फिर मोदी सरकार’ और कांग्रेस ‘चौकीदार चोर है’ के नारे के साथ मैदान में हैं। यह पहला चुनाव नहीं है, जब सियासी दल नारों पर फोकस कर रहे हैं।

पिछले चुनाव के दौरान ‘अब की बार मोदी सरकार’ और ‘हर-हर मोदी’  ‘घर-घर मोदी’ ने प्रधानमंत्री के नाम की हवा बनाने का काम किया था। आज हम देश के चुनावी इतिहास के ऐसे नारों की बात करेंगे, जिन्होंने दिल्ली का मज़बूत से मज़बूत तख्त पलटा।

इमरजेंसी के बाद आई नारों की बाढ़

दुर्भाग्य से महात्मा गांधी स्वतंत्र भारत के पहले लोकतान्त्रिक चुनाव तक हमारे बीच नहीं रह पाए और उनकी हत्या हो गई। उसके बाद कांग्रेस के चुनाव चिन्ह बैलों की जोड़ी के खिलाफ जनसंघ ने नारा दिया था, देखो दीए का खेल, जली झोंपड़ी, भागे बैल, जनसंघ का चुनाव चिन्ह तब दीयाबाती था। कांग्रेस ने जवाबी हमला बोला, नारा था- इस दिए में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं

लेकिन चुनावी नारों की असली धमाल इंदिरा गांधी के शासनकाल में शुरू हुई। 1971 में कांग्रेस ने नारा दिया- गरीबी हटाओ, इंदिरा लाओ। अगले चुनाव में यह नारा विपक्ष ने यूं बदल दिया- इंदिरा हटाओ, देश बचाओ। 1975 की इमरजेंसी ने तो कई चुनावी नारों को जन्म दिया। उस दौर में एक नारा बड़ा मशहूर हुआ था-

जमीन गई चकबंदी में, मर्द गए नसबंदी में, नसबंदी के तीन दलाल- इंदिरा, संजय, बंसीलाल।

कांग्रेस के खिलाफ उस चुनाव में नारों की बाढ़ आ गई थी। संजय की मम्मी, बड़ी निक्कमी, बेटा कार बनाता है, मम्मी बेकार बनाती है। इन्हीं नारों की बदौलत विपक्ष ने आपातकाल की टीस को खूब कुरेदा और नतीज़ा यह हुआ कि इंदिरा गांधी और कांग्रेस बुरी तरह चुनाव हार गए। बाद में 1980 में आते-आते जनसंघ, बी.जे.पी. में बदल गया और दीयाबाती, कमल के फूल में

उधर कांग्रेस का चुनाव चिन्ह गाय बछड़ा भी हाथ बन गया। लेकिन उस चुनाव का सबसे दिलचस्प नारा वामपंथियों ने दिया था-

चलेगा मज़दूर उड़ेगी धूल, न बचेगा हाथ न रहेगा फूल।

लेकिन अंतत श्रीकांत वर्मा के लिखे नारे ने बाज़ी मारी।

न जात पर न पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मोहर लगेगी हाथ पर’

अगला चुनाव आते-आते इंदिरा की हत्या हो चुकी थी। कांग्रेस के इस नारे ने पार्टी को अकूत बहुमत दिलाया।

‘जब तक सूरज चांद रहेगा इंदिरा तेरा नाम रहेगा’

नारों की सियासत में क्षेत्रीय दल भी पीछे नहीं हैं। किसी जमाने में बिहार में ऊंची जातियों के खिलाफ लालू प्रसाद यादव का नारा

भूरा बाल साफ करो, जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब रहेगा बिहार में लालू।

उधर सपा के खिलाफ बसपा ने नारा दिया था,

ढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर

बसपा ने ही एक समय यूपी में नारा दिया था,

तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार।

जब सपा और बसपा ने मिलकर बीजेपी को हराया था, उस चुनाव में नारा था,

मिले मुलायम और कांशीराम, हवा में उड़ेगा जय श्री राम।

पंजाब में पिछले चुनाव का बड़ा नारा था- कैप्टन ने सौं चक्की, हर घर इक नौकरी पक्की। एम.पी. में कांग्रेस का नारा था-

कर्जा माफ, बिजली हाफ, करो कांग्रेस साफ।

जब चला वी.पी. का चक्र

1989 में चुनाव में कांग्रेस सत्ताच्युत हुई और वी.पी. सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी। उस दौर का चर्चित नारा था-

राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है।

यह दीगर बात है कि 1990 में मंडल आयोग आंदोलन ने वी पी.सिंह की तकदीर को बतौर पी.एम. ग्रहण लगा दिया। उनके लिए तब नारा लगा था-

गोली मारो मंडल को, इस राजा को कमंडल दो।

उसके बाद के चुनाव का सबसे चर्चित नारा बी.जे.पी. ने दिया था- सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे। फिर बी.जे.पी. का नया नारा आया

अटल, अडवानी कमल निशान मांग रहा हिंदुस्तान।

उसी चुनाव में यह भी आया-

सबको देखा बारी-बारी, अबकी बारी, अटल बिहारी।

फिर उसके बाद के चुनाव में कोई ऐसा नारा नहीं आया, जो हर किसी की जुबां पर रहा हो।

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