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नवरात्रि पूजा घर पर कैसे करें? नौ दिनों की आसान विधि

नवरात्रि आते ही घर का माहौल अपने आप बदल जाता है। सुबह-सुबह घंटी की आवाज़, धूप-अगरबत्ती की ख़ुशबू और रसोई से आती व्रत के खाने की महक। बहुत से लोग इसी उलझन में रह जाते हैं कि पूजा कैसे शुरू करें और कहीं कोई गलती न हो जाए।

तो सबसे पहले एक बात। माँ को आपकी सच्ची श्रद्धा चाहिए, कोई परफ़ेक्ट पूजा नहीं। अगर पूरी विधि याद नहीं रहती तो भी चिंता मत कीजिए। नीचे सब कुछ आसान भाषा में, एक-एक कदम करके समझाया है। इस साल नवरात्रि 11 अक्टूबर 2026 से शुरू हो रही है, तो चलिए तैयारी शुरू करते हैं।

Navratri-Puja-Guide

पूजा से पहले क्या-क्या सामान चाहिए

सब कुछ पहले से रख लें, ताकि पूजा के बीच में उठकर भागना न पड़े।

सामान किसलिए
मिट्टी का कलश और उसका ढक्कन घटस्थापना के लिए
जौ और मिट्टी (छोटा बर्तन) जौ बोने के लिए
गंगाजल, साफ़ पानी कलश में भरने के लिए
आम के पत्ते (5 या 7), नारियल, लाल चुनरी या कपड़ा कलश सजाने के लिए
रोली, चावल (अक्षत), मौली (कलावा) तिलक और पूजा के लिए
फूल, माला माँ को चढ़ाने के लिए
दीपक, घी या तेल, बाती आरती और अखंड ज्योति के लिए
धूप, अगरबत्ती, कपूर वातावरण शुद्ध करने के लिए
फल, मिठाई या घर का बना भोग प्रसाद के लिए
माँ दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर पूजा के स्थान पर रखने के लिए

पहला दिन: घटस्थापना कैसे करें

पहला दिन सबसे ख़ास होता है, क्योंकि इसी दिन माँ को घर में बुलाया जाता है।

कदम 1: सफ़ाई। सुबह जल्दी उठकर नहाएँ और पूजा वाली जगह अच्छे से साफ़ करें। साफ़ कपड़े पहनें।

कदम 2: जौ बोएँ। एक चौड़े बर्तन में थोड़ी मिट्टी डालकर जौ फैला दें और हल्का पानी छिड़कें। ये नौ दिन में हरे-हरे अंकुर बन जाते हैं, जिन्हें शुभ माना जाता है।

कदम 3: कलश तैयार करें। कलश में साफ़ पानी और थोड़ा गंगाजल भरें। मुँह पर आम के पत्ते लगाएँ, उन पर ढक्कन रखें और ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें। कलश पर रोली से स्वस्तिक बनाएँ और मौली बाँधें।

कदम 4: स्थापना। कलश को जौ के बर्तन के बीच या उसके पास पूजा स्थल पर रखें। फिर माँ की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

कदम 5: दीपक जलाएँ। माँ के सामने दीपक जलाकर उनका आवाहन करें और हाथ जोड़कर अपनी मनोकामना कहें।

मुहूर्त का ध्यान: घटस्थापना का शुभ समय शहर के हिसाब से थोड़ा बदलता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग या पंडित जी से सही मुहूर्त ज़रूर पूछ लें।

रोज़ की पूजा कैसे करें 

पहले दिन के बाद बाकी आठ दिन रोज़ की पूजा बहुत सरल है।

समय क्या करें
सुबह स्नान के बाद कलश और माँ को प्रणाम करें, दीपक जलाएँ, फूल चढ़ाएँ
पूजा के दौरान माँ के उस दिन वाले रूप का नाम लें और मंत्र पढ़ें
भोग माँ को भोग लगाएँ, फिर परिवार में प्रसाद बाँटें
आरती दुर्गा चालीसा या दुर्गा आरती करें
शाम दीपक जलाएँ, एक बार फिर आरती करें
जौ की देखभाल रोज़ थोड़ा पानी छिड़कें

अगर आप अखंड ज्योति जलाना चाहें तो ध्यान रखें कि वह नौ दिन तक बुझे नहीं। यह ज़रूरी नहीं है। जिन घरों में रोज़ देखभाल करना मुश्किल हो, वे सुबह-शाम का दीपक जलाकर भी पूजा कर सकते हैं।

एक आसान मंत्र जो रोज़ पढ़ा जा सकता है: “ॐ दुं दुर्गायै नमः”। इसे 11 या 21 बार जपना काफ़ी है।

नौ दिन, नौ रूप: किस दिन किसकी पूजा

दिन तारीख माँ का रूप आम तौर पर लगाया जाने वाला भोग
1 11 अक्टूबर शैलपुत्री गाय का घी
2 12 अक्टूबर ब्रह्मचारिणी शक्कर या मिश्री
3 13 अक्टूबर चंद्रघंटा दूध या खीर
4 14 अक्टूबर कूष्मांडा मालपुआ
5 15 अक्टूबर स्कंदमाता केला
6 16 अक्टूबर कात्यायनी शहद
7 17 अक्टूबर कालरात्रि गुड़
8 18 अक्टूबर महागौरी नारियल
9 19 अक्टूबर सिद्धिदात्री हलवा, पूड़ी, चना या तिल

भोग की यह सूची परंपरा और क्षेत्र के हिसाब से थोड़ी अलग हो सकती है। जो आपके घर में चलन में है, वही रखें। और अगर कुछ ना बन पाए तो सिर्फ़ फल या मिश्री का भोग भी माँ स्वीकार करती हैं।

एक छोटी जानकारी: पंचांग के अनुसार इस बार अष्टमी और नवमी दोनों 19 अक्टूबर को पड़ रही हैं। इसलिए आख़िरी दिनों की पूजा और कन्या पूजन का समय पहले से देख लें।

अष्टमी या नवमी: कन्या पूजन

नवरात्रि की सबसे प्यारी रस्म शायद यही है। नौ छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर घर बुलाया जाता है।

  1. कन्याओं के पैर साफ़ पानी से धोएँ और उन्हें आसन पर बैठाएँ।
  2. माथे पर तिलक लगाएँ और कलावा बाँधें।
  3. हलवा, पूड़ी और चने का प्रसाद श्रद्धा से खिलाएँ।
  4. अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार या दक्षिणा दें और पैर छूकर आशीर्वाद लें।

साथ में एक छोटे बालक को भी बैठाने की परंपरा है। उसे भैरव का रूप माना जाता है।

व्रत रखें तो ये बातें याद रखें

  • व्रत की परंपरा हर परिवार में अलग होती है। कोई नौ दिन रखता है, कोई सिर्फ़ पहला और आख़िरी दिन।
  • पानी, दूध, फल, मखाना, साबूदाना और कुट्टू जैसी चीज़ें आम तौर पर खाई जाती हैं।
  • अगर आप बुज़ुर्ग हैं, किसी बीमारी में हैं या दवा ले रहे हैं, तो व्रत के नियम अपनी सेहत देखकर तय करें, और ज़रूरत हो तो डॉक्टर से पूछ लें।
  • माँ भूखे रहने से नहीं, मन की सच्चाई से प्रसन्न होती हैं।

विजयादशमी और विसर्जन

नौवें दिन की पूजा के बाद अगले दिन (इस साल 20 अक्टूबर) विजयादशमी मनाई जाती है। इस दिन जौ के अंकुर परिवार में बाँटे जाते हैं और कलश का जल घर में छिड़का जाता है। पूजा समाप्त करते समय माँ से अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा माँगना न भूलें।

अक्सर लोग नवरात्रि को “बहुत मुश्किल पूजा” समझकर घबरा जाते हैं। सच यह है कि एक दीपक, एक फूल और सच्चे मन से लिया गया माँ का नाम भी काफ़ी है। बाकी सब बस उस भावना को सुंदर बनाने का तरीका है।

आपकी नवरात्रि मंगलमय हो। जय माता दी!

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