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	<title>revolutionaries Archives - Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</title>
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	<description>रोचक तथ्य और जानकारी हिन्दी में!</description>
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		<title>जन्मदिन विशेष &#8211; नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े कुछ रोचक तथ्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[अरविन्द कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 Jan 2024 04:00:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>सुभाष चन्द्र बोस (23 जनवरी 1897 &#8211; 18 अगस्त 1945) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिए, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया था। उनके द्वारा दिया गया &#8220;जय हिन्द&#8221; का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>सुभाष चन्द्र बोस (23 जनवरी 1897 &#8211; 18 अगस्त 1945) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिए, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया था।<sup id="cite_ref-An_Introduction_to_Military_Science_p._4_1-0" class="reference"></sup> उनके द्वारा दिया गया &#8220;<strong>जय हिन्द&#8221;</strong> का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है।</p>
<p>&#8220;<strong>तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा</strong>&#8221; का नारा भी उनका था जो उस समय अत्यधिक प्रचलन में आया। <sup id="cite_ref-2" class="reference"></sup>भारतवासी उन्हें नेता जी के नाम से सम्बोधित करते हैं। नेता जी बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में बहुत तेज़ थे।</p>
<p>इस लेख में हम जानेंगे नेताजी से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में, तो चलिए शुरू करते हैं</p>
<p><img data-recalc-dims="1" fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-16704" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/01/netaji-subhas-chandra-bose.jpg?resize=696%2C391&#038;ssl=1" alt="" width="696" height="391" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/01/netaji-subhas-chandra-bose.jpg?w=600&amp;ssl=1 600w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/01/netaji-subhas-chandra-bose.jpg?resize=300%2C169&amp;ssl=1 300w" sizes="(max-width: 696px) 100vw, 696px" /></p>
<ul>
<li>नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा, बंगाल डिविजन के कटक में हुआ था। बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियां और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी 9वीं संतान और 5वें बेटे थे।</li>
<li>नेताजी की प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। इसके बाद उनकी शिक्षा कोलकाता के प्रेजीडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई। इसके बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा (इंडियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया।</li>
<li>1920 में उन्होंने इंग्लैंड में सिविल सर्विस परीक्षा पास की लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में हिस्सा लेने के लिए उन्होंने जॉब छोड़ दी थी। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वह देश के अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना से वह बहुत ज्यादा विचलित और प्रभावित हुए।</li>
<li>कांग्रेस में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, तो वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। इसलिए नेताजी गांधी जी के विचारों से सहमत नहीं थे। हालांकि, दोनों का मकसद सिर्फ और सिर्फ एक था कि भारत को आजाद कराया जाए। नेताजी का ऐसा मानना था कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए सशस्त्र क्रांति की आवश्यकता है, तो वहीं गांधी अहिंसक आंदोलन में विश्वास करते थे।</li>
<li>साल 1938 में नेताजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित किए गए, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। 1939 के कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी के समर्थन से खड़े पट्टाभी सीतारमैया को हराकर विजय प्राप्त की। इस पर गांधी और बोस के बीच अनबन बढ़ गई, जिसके बाद नेताजी ने खुद ही कांग्रेस को छोड़ दिया।</li>
<li>नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने साल 1937 में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। दोनों की एक बेटी अनीता हुई, और वर्तमान में वो जर्मनी में अपने परिवार के साथ रहती हैं।</li>
<li>अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने के लिए नेताजी ने 21 अक्टूबर 1943 को &#8216;<strong>आजाद हिंद सरकार</strong>&#8216; की स्थापना करते हुए &#8216;<strong>आजाद हिंद फौज</strong>&#8216; का गठन किया। इसके बाद सुभाष चंद्र बोस अपनी फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा (अब म्यांमार) पहुंचे। यहां उन्होंने नारा दिया &#8216;<strong>तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा</strong>।&#8217;</li>
<li>1921 से 1941 के दौरान वो पूर्ण स्वराज के लिए कई बार जेल भी गए थे। उनका मानना था कि अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता नहीं पाई जा सकती। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने सोवियत संघ, नाजी जर्मनी, जापान जैसे देशों की यात्रा की और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सहयोग मांगा।</li>
<li>सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद रेडियो स्टेशन जर्मनी में शुरू किया और पूर्वी एशिया में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया। सुभाष चंद्र बोस मानते थे कि भगवत गीता उनके लिए प्रेरणा का मुख्य जरिया थी।</li>
<li>18 अगस्त, 1945 को ताइपेई में हुई एक विमान दुर्घटना के बाद नेताजी लापता हो गए थे। घटना को लेकर तीन जांच आयोग बैठे, जिसमें से दो जांच आयोगों ने दावा किया कि दुर्घटना के बाद नेताजी की मृत्यु हो गई थी। जबकि न्यायमूर्ति एमके मुखर्जी की अध्यक्षता वाले तीसरे जांच आयोग का दावा था कि घटना के बाद नेताजी जीवित थे। इस विवाद ने बोस के परिवार के सदस्यों के बीच भी मनमुटाव ला दिया था।</li>
</ul>
<h2>नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में अन्य तथ्य</h2>
<ul>
<li>साल 1942 में नेता जी <strong>हिटलर</strong> से मिले थे, लेकिन हिटलर के मन में भारत को आज़ाद करवाने के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं थी। हिटलर ने नेताजी को सहायता के लिए कोई स्पष्ट वचन नहीं दिया था।</li>
<li>नेताजी की भारतीय <strong>सिविल सेवा परीक्षा</strong> में <strong>रैंक 4</strong> थी, लेकिन <strong>आज़ादी</strong> की जंग में शामिल होने के लिए उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की आरामदेह नौकरी ठुकरा दी थी।</li>
<li>नेताजी को <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%BC" target="_blank" rel="noopener"><strong>जलियावाला हत्याकांड</strong></a> ने इस कदर विचलित कर दिया था कि वह सब कुछ छोड़कर भारत की आज़ादी के संग्राम में शामिल हो गए।</li>
<li>1943 में <strong>बर्लिन</strong> में नेताजी ने <strong>आज़ाद हिंद रेडियो</strong> और <strong>फ्री इंडिया सेंटर</strong> की स्थापना की थी।</li>
<li>1943 में स्थापित हुए <strong>आज़ाद हिंद बैंक</strong> ने दस रुपये के सिक्के से लेकर एक लाख रुपये के नोट जारी किये थे, एक लाख रुपये के नोट पर सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर छापी गयी थी।</li>
<li>नेताजी ने ही गांधीजी को <strong>राष्ट्रपिता</strong> कह कर संबोधित किया था।</li>
<li>नेताजी को 1921 से 1941 के बीच 11 बार भारत की <strong>अलग-अलग जेलों में कैद</strong> में रखा गया था।</li>
<li>नेताजी का ऐसा मानना था कि <strong>अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए सशक्त क्रांति की आवश्यकता</strong> है, लेकिन गांधी जी अहिंसक आंदोलन में विश्वास करते थे।</li>
<li>नेताजी को भारतीय राष्ट्रीय <strong>कांग्रेस</strong> का दो बार <strong>अध्यक्ष</strong> चुना गया था।</li>
<li>नेताजी की <strong>मृत्यु</strong> कैसे हुई, यह गुत्थी आज भी अनसुलझी है। उनकी मृत्यु की आज तक कोई पुष्टि नहीं हो सकी। यहां तक कि भारत सरकार भी उनकी मौत के बारे में कुछ नहीं बोलना चाहती।</li>
<li>17 मई 2006 को <strong>जस्टिस मुखर्जी कमीशन</strong> ने एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें इस बात का जिक्र था कि रंकजी मंदिर में पाई जाने वाली राख नेताजी की नहीं थी। हालांकि इस रिपोर्ट को भारत सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया और यह मामला आज भी एक रहस्य ही है।</li>
</ul>
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		<title>क्रांतिकारियों के आदर्श थे &#8216;चंद्रशेखर आजाद&#8217;!!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Mamta Bansal]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Feb 2022 12:29:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
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		<category><![CDATA[Chandrashekhar Azad]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>देश को आजाद करवाने के लिए हजारों नौजवानों ने क्रांति का रास्ता अपना कर अंग्रेजों को इस देश से भगाने के महायज्ञ में अपने जीवन की आहुति डली, जिनके बलिदानों के कारण आज हम स्वतन्त्र देश की हवा में जी रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के विरले नायकों के नामों की श्रृंखला में अमर शहीद चंद्रशेखर [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>देश को आजाद करवाने के लिए हजारों नौजवानों ने क्रांति का रास्ता अपना कर अंग्रेजों को इस देश से भगाने के महायज्ञ में अपने जीवन की <strong>आहुति</strong> डली, जिनके बलिदानों के कारण आज हम स्वतन्त्र देश की हवा में जी रहे हैं। <strong>स्वतंत्रता संग्राम</strong> के विरले नायकों के नामों की श्रृंखला में <strong>अमर शहीद चंद्रशेख</strong>र आजाद एक ऐसा नाम है जिसके स्मरण मात्र से शरीर की रगें फड़कने लगती हैं।</p>
<p>इस वीर का जन्म 23 जुलाई, 1906 को <strong>मध्यप्रदेश</strong> की <strong>अलीराजपुरा</strong> रियासत के <strong>मामरा ग्राम</strong> में मां जगरानी की कोख से गरीब तिवारी परिवार में पांचवी संतान के रूप में हुआ।</p>
<p><img data-recalc-dims="1" decoding="async" class="size-full wp-image-33724 aligncenter" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/Ideal-of-revolutionaries-Chandrashekhar-Azad.jpeg?resize=696%2C390&#038;ssl=1" alt="" width="696" height="390" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/Ideal-of-revolutionaries-Chandrashekhar-Azad.jpeg?w=750&amp;ssl=1 750w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/Ideal-of-revolutionaries-Chandrashekhar-Azad.jpeg?resize=300%2C168&amp;ssl=1 300w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/Ideal-of-revolutionaries-Chandrashekhar-Azad.jpeg?resize=696%2C390&amp;ssl=1 696w" sizes="(max-width: 696px) 100vw, 696px" /></p>
<p>पिता <strong>सीता राम तिवारी</strong> बहुत ही मेहनती और धार्मिक विचारों के थे। चंद्रशेखर की आरम्भिक शिक्षा गांव में ही हुई। यहीं पर उन्होंने धनुष-बाण चलाना सीखा और <a href="https://fundabook.com/who-was-the-greatest-archer-in-mahabhart-dwapar-yuga/">महाभारत के अर्जुन</a> जैसे <strong>निशानेबाज</strong> बने, जिसका फायदा उन्हें क्रांति और स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में गोलियों के निशाने लगाने में मिला।</p>
<p>14 वर्ष की आयु में इन्हें <strong>संस्कृत</strong> पढ़ने के लिए काशी भेजा गया। काशी में ही <strong>चंद्रशेखर</strong> देश को आजाद करवाने के लिए प्रयासरत क्रांतिकारी वीरों के सम्पर्क में आए और उनके प्रभाव से छोटी आयु में ही देश को आजाद करवाने के कांटो भरे रास्ते पर चल पड़े।</p>
<p>काशी संस्कृत <strong>महाविद्यालय</strong> में पढ़ते हुए असहयोग आंदोलन में उन्होंने पहला धरना दिया जिसके कारण पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर न्यायाधीश के सामने पेश किया। न्यायाधीश के साथ सवांद से आजाद सुर्खियों में आ गए।</p>
<p>न्यायाधीश ने जब बालक चंद्रशेखर से उनका तथा उनके पिता का नाम और पता पूछा तो चंद्रशेखर ने अपना नाम &#8216;<strong>आजाद</strong>&#8216;, पिता का नाम &#8216;<strong>स्वतंत्र</strong>&#8216; और निवास &#8216;<strong>बंदीगृह</strong>&#8216; बताया जिससे इनका नाम हमेशा के लिए &#8220;<strong>चंद्रशेखर आजाद&#8221;</strong> मशहूर हो गया।</p>
<p>बालक चंद्रशेखर के उत्तर से मैजिस्ट्रेट गुस्से से लाल हो गया और उन्हें 15 बेंतों की कड़ी सजा सुनाई। जिसे देश के मतवाले इस निडर बालक ने प्रत्येक बेंत के शरीर पर पड़ने पर &#8216;<strong>भारत माता की जय</strong>&#8216; और &#8216;<strong>वंदे मातरम्</strong>&#8216; का जयघोष कर स्वीकार किया।</p>
<p>इस घटना के बाद अन्य क्रांतिकारियों <a href="https://fundabook.com/shaheed-bhagat-singhs-precious-age-promotional-thoughts/">भगत सिंह</a>, <strong>राम प्रसाद बिस्मिल</strong>, <strong>राजगुरु</strong>, <strong>सुखदेव</strong> से इनका सम्पर्क हुआ और तब आजाद पूरी तरह से क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए।</p>
<p>इसी दौरान <strong>साइमन कमिशन</strong> के विरोध में बरसी लाठियों के कारण <strong>लाला लाजपतराय जी</strong> के शहीद होने से क्रांतिकारी योद्धाओं ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी और &#8216;<strong>खून का बदला खून</strong>&#8216; से लेने का प्रण कर दोषी पुलिस अफसरों को सजा देने का निर्णय लिया। अपने प्रिय नेता लाला लाजपतराय जी की हत्या का बदला लेने के लिए वह क्रांतिकारी दल के नेता बनाए गए।</p>
<p>17 दिसम्बर, 1928 को आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने पुलिस अधीक्षक लाहौर कार्यालय के पास दफ्तर से निकलते ही <strong>सांडर्स</strong> का वध कर दिया।</p>
<p>लाहौर नगर के चप्पे-चप्पे पर पर्चे चिपका दिए गए कि लाला जी की शहादत का बदला ले लिया गया है। पूरे देश क्रांतिकारियों के इस कदम को खूब सराहा गया।</p>
<p>9 अगस्त, 1925 को कलकत्ता मेल को राम प्रसाद <strong>बिस्मिल</strong> और <strong>चंद्रशेखर</strong> के नेतृत्व में लूटने की योजना बनी जिसे इन्होंने अपने 8 साथियों की सहायता से &#8216;<strong>काकोरी स्टेशन</strong>&#8216; के पास बहुत ही अच्छे ढंग से सम्पन्न किया।</p>
<p>इस घटना से ब्रिटिश सरकार पूरी तरह से बोखला गई और उन्होंने जगह-जगह छापामारी कर कुछ क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया जिन्होंने पुलिस की मार से अपने साथियों के ठिकाने बता दिए।</p>
<p>क्रांतिकारियों का पता मिलने से ब्रिटिश पुलिस ने कई क्रांतिकारियों को पकड़ लिया और <strong>राम प्रसाद बिस्मिल</strong>, <strong>अशफाक उल्ला खां</strong> सहित 4 वीरों को फांसी देकर शहीद कर दिया परन्तु आजाद पुलिस की पकड़ में नहीं आए तो ब्रिटिश पुलिस ने इन पर 30000 रुपए के ईनाम की घोषणा कर दी।</p>
<p>27 फरवरी, 1931 के दिन आजाद अपने एक साथी के साथ इलाहाबाद के <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%B0_%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A6_%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95,_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C" target="_blank" rel="noopener"><strong>अल्‍फ्रेड पार्क </strong></a> में बैठे अगली रणनीति पर विचार कर रहे थे कि पैसों के लालच में किसी मुखबिर ने पुलिस को खबर कर दी।</p>
<p>पुलिस ने तुरन्त सुपरिटेंडेंट <strong>नाट बाबर</strong> के नेतृत्व में इन्हें घेर लिया। 20 मिनट तक भारत माता के इस शेर ने पुलिस का मुकाबला किया और अपने बेहतरीन निशाने से कइयों को मौत के घाट उतार दिया।</p>
<p>इस मुकाबले में चंद्रशेखर भी घायल हो गई। उनके पास जब अंतिम गोली रह गई तो उन्होंने उसे कनपटी पर लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर आजादी के महायज्ञ में अपने जीवन की आहूति डाल दी। चंद्रशेखर आजाद थे और अंतिम समय तक आजाद ही रहे।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें :-</strong></p>
<ul>
<li><strong><a href="https://fundabook.com/martyr-bhagat-singh-was-born-on-this-day/">शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के परिवार की रगों में दौड़ती थी देशभक्ति</a></strong></li>
<li><strong><a href="https://fundabook.com/these-are-10-slogans-of-shaheed-e-azam-bhagat-singh/">शहीद-ए-आजम भगत सिंह के 10 लोकप्रिय नारे</a></strong></li>
</ul>
<p>The post <a href="https://fundabook.com/ideal-of-revolutionaries-chandrashekhar-azad-hindi/">क्रांतिकारियों के आदर्श थे &#8216;चंद्रशेखर आजाद&#8217;!!</a> appeared first on <a href="https://fundabook.com">Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</a>.</p>
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