नवरात्र का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। वे मां दुर्गा की दूसरी शक्ति मानी जाती हैं। मां की पूजा से ज्यादा लोग उनकी कथा सुनते हैं। वजह साफ है। यह कथा सिर्फ एक देवी की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जिसने ठान लिया और फिर पीछे नहीं हटा। आइए, इस कथा को आसान भाषा में शुरू से जानते हैं।

नाम का मतलब क्या है
पहले नाम को समझ लेते हैं।
| शब्द | मतलब |
|---|---|
| ब्रह्म | तप, तपस्या |
| चारिणी | आचरण करने वाली |
| ब्रह्मचारिणी | तप का आचरण करने वाली देवी |
यानी जिसने अपना पूरा जीवन तप को दे दिया। इसी वजह से मां के हाथ में माला और कमंडल दिखाई देते हैं।
कथा की शुरुआत: सती से पार्वती तक
बहुत समय पहले की बात है। राजा दक्ष की बेटी थीं सती। उनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। एक बार राजा दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ किया। उसमें उन्होंने सबको बुलाया, पर शिव जी को नहीं। ऊपर से उन्होंने शिव जी का अपमान भी किया। सती यह सहन नहीं कर पाईं। उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। पर कथा यहीं खत्म नहीं होती। सती ने संकल्प लिया था कि अगले जन्म में भी वे शिव जी की ही अर्धांगिनी बनेंगी। उनका अगला जन्म हुआ पर्वतराज हिमालय के घर। तब उनका नाम पड़ा पार्वती। उन्हें शैलपुत्री भी कहा गया। नवरात्र के पहले दिन इन्हीं की पूजा होती है।
नारद जी का आना
जब पार्वती बड़ी हुईं, तो एक दिन देवर्षि नारद हिमालय के महल में आए। नारद जी ने पार्वती का भविष्य बताया। उन्होंने कहा:
“यह कन्या बहुत भाग्यशाली है। इसका विवाह भगवान शिव से होगा।”
यह सुनकर हिमालय और उनकी पत्नी मैना बहुत खुश हुए। फिर नारद जी ने एक बात और कही। उन्होंने बताया कि शिव जी सांसारिक सुखों से दूर रहने वाले योगी हैं। उन्हें पाना आसान नहीं होगा। इसके लिए कठिन तपस्या करनी पड़ेगी। पार्वती ने यह बात गांठ बांध ली। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया कि मुझे शिव जी ही चाहिए। और अगर तप ही रास्ता है, तो मैं तप करूंगी।
माता-पिता को मनाना
पार्वती ने अपने माता-पिता से तपस्या के लिए जाने की अनुमति मांगी। मां मैना का दिल घबरा गया। वे बेटी को कष्ट में नहीं देखना चाहती थीं। उन्होंने बहुत समझाया और कहा, “उ मा”, यानी “बेटी, मत करो।” कहा जाता है कि इसी वजह से पार्वती का एक नाम उमा पड़ा। लेकिन पार्वती का इरादा पक्का था। आखिर माता-पिता ने उन्हें जाने की आज्ञा दे दी।
तपस्या के वे कठिन साल
अब शुरू हुई असली परीक्षा। पार्वती राजमहल का सुख छोड़कर वन में चली गईं। कथाओं के अनुसार उनकी तपस्या कुछ इस तरह आगे बढ़ी:
| समय | क्या किया |
|---|---|
| शुरुआती हजार साल | सिर्फ फल और फूल खाकर तप किया |
| अगले सौ साल | सिर्फ साग और पत्ते खाए |
| कई सालों तक | खुले आसमान के नीचे रहीं |
| धूप, बारिश और ठंड | हर मौसम सहा, पर तप नहीं छोड़ा |
| कई हजार साल | सूखे बेलपत्र खाकर साधना की |
| आखिर में | सूखे पत्ते भी छोड़ दिए |
जब उन्होंने पत्ते खाना भी छोड़ दिया, तब उनका नाम अपर्णा पड़ा। अपर्णा का मतलब है, जिसने पत्ता तक न खाया। सोचिए, कितना धैर्य होगा। कोई शॉर्टकट नहीं था। कोई जल्दी नहीं थी। बस रोज की साधना थी।
जब सारे लोक हिल गए
मां की तपस्या इतनी कठोर थी कि उसकी चर्चा तीनों लोकों में होने लगी। उनका शरीर बहुत कमजोर हो गया था। फिर भी चेहरे पर तेज था। देवता, ऋषि और मुनि सब मां की प्रशंसा करने लगे। सबने माना कि ऐसी तपस्या पहले किसी ने नहीं की। तब ब्रह्मा जी की आकाशवाणी हुई। उसमें कहा गया:
“देवी, तुम्हारे जैसी तपस्या आज तक किसी ने नहीं की। तुम्हारी मनोकामना जरूर पूरी होगी। अब तप छोड़कर घर लौट जाओ। तुम्हें शिव जी पति के रूप में मिलेंगे।”
परीक्षा की एक और घड़ी
कुछ कथाओं में एक और प्रसंग आता है। कहते हैं कि शिव जी ने पार्वती की सच्चाई परखने के लिए सप्तऋषियों को भेजा। बाद में वे खुद भी भेष बदलकर आए। उन्होंने पार्वती से कहा, “शिव तो श्मशान में रहते हैं। वे तुम्हारे लायक नहीं हैं। किसी और को चुन लो।” पार्वती ने साफ जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मैं उन्हें जानती हूं। मेरा मन बदलने वाला नहीं है। चाहे करोड़ों साल तप करना पड़े, मैं शिव जी को ही चुनूंगी। इस जवाब से शिव जी प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने पार्वती को अपनाया।
(यह प्रसंग अलग-अलग पुराणों और परंपराओं में थोड़े अलग रूप में मिलता है।)
कथा का अंत
इसके बाद शिव जी और पार्वती का विवाह हुआ। मां की सालों की साधना सफल हुई। यही रूप, यानी तप में लगी हुई पार्वती, मां ब्रह्मचारिणी के नाम से पूजा जाता है।
मां का स्वरूप और उसका संदेश
मां के रूप की हर चीज कुछ कहती है।
| स्वरूप | इसका संदेश |
|---|---|
| सफेद वस्त्र | मन की पवित्रता |
| दाएं हाथ में माला | रोज की साधना और लगन |
| बाएं हाथ में कमंडल | सादगी और संयम |
| बिना वाहन के चलना | बिना सहारे के भी आगे बढ़ने का हौसला |
| शांत चेहरा | धैर्य और स्थिरता |
इस कथा से हम क्या सीखें
1. लक्ष्य साफ रखें
मां को पता था कि उन्हें क्या चाहिए। जब मंजिल साफ होती है, तो रास्ता भी मिल जाता है।
2. धैर्य रखें
मां ने सालों इंतजार किया। आज हम दो दिन में थक जाते हैं। मां की कथा याद दिलाती है कि बड़े काम में समय लगता है।
3. मुश्किल में भी डटे रहें
धूप, बारिश, ठंड और भूख, सब सहा। फिर भी मां पीछे नहीं हटीं।
4. दूसरों की बातों से न डिगें
लोगों ने कहा, “रुक जाओ।” पर मां ने अपने मन की सुनी।
5. सादगी में भी ताकत है
मां के पास न राजसी ठाठ था, न कोई वाहन। फिर भी वे सबसे ताकतवर साबित हुईं।
आज की जिंदगी में यह कथा क्यों जरूरी है
आज के समय में हम सब जल्दी में हैं। हर चीज तुरंत चाहिए। नतीजा न मिले, तो हम हार मान लेते हैं। ऐसे में मां ब्रह्मचारिणी की कथा एक सहारा है। यह कहती है:
- विद्यार्थी हो, तो रोज पढ़ो। एक दिन में रिजल्ट नहीं आता।
- नौकरी ढूंढ रहे हो, तो कोशिश मत छोड़ो।
- अपना काम शुरू किया हो, तो टिके रहो।
- कोई सपना हो, तो उसे रोज थोड़ा-थोड़ा पूरा करो।
इसीलिए इस दिन को खासतौर पर विद्यार्थियों और मेहनत करने वालों के लिए शुभ माना जाता है।
कथा सुनने के बाद पूजा कैसे करें
अगर आप आज मां की पूजा कर रहे हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें।
पूजा की आसान विधि:
- सुबह नहाकर साफ कपड़े पहनें।
- कलश के पास मां की तस्वीर रखें।
- रोली, चावल और सफेद फूल चढ़ाएं।
- घी का दीया जलाएं।
- चीनी, मिश्री या पंचामृत का भोग लगाएं।
- मंत्र का जाप करें।
- आरती करके प्रसाद बांटें।
बीज मंत्र:
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥
प्रार्थना मंत्र:
या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
मां को प्रिय भोग
| भोग | मान्यता |
|---|---|
| चीनी | मां को बहुत प्रिय मानी जाती है |
| मिश्री | शुद्धता का प्रतीक |
| पंचामृत | दूध, दही, घी, शहद और चीनी से बनता है |
माना जाता है कि इस भोग से घर के सदस्यों को लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है। भोग का एक हिस्सा घर के बड़ों को जरूर दें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. मां ब्रह्मचारिणी कौन हैं?
वे मां दुर्गा का दूसरा रूप हैं। वे पार्वती जी का वह रूप हैं जब उन्होंने शिव जी को पाने के लिए तप किया था।
2. उनका नाम अपर्णा क्यों पड़ा?
कठिन तप में उन्होंने पत्ते खाना भी छोड़ दिया था। इसलिए उन्हें अपर्णा कहा गया।
3. उन्हें उमा क्यों कहते हैं?
कथा के अनुसार, मां मैना ने उन्हें तप से रोकने के लिए “उ मा” कहा था। यहीं से यह नाम चला।
4. मां के हाथ में क्या होता है?
दाएं हाथ में माला और बाएं हाथ में कमंडल।
5. यह कथा किन ग्रंथों में मिलती है?
इसका उल्लेख शिव पुराण, देवी भागवत और रामचरितमानस जैसे ग्रंथों में अलग-अलग रूप में मिलता है।
मां ब्रह्मचारिणी की कथा हमें एक सीधी बात सिखाती है। जो टिका रहता है, वही पाता है। आज मां के आगे एक दीया जलाइए। अपने सपने मन ही मन उन्हें बता दीजिए। फिर उन्हें पूरा करने में जुट जाइए। मां ब्रह्मचारिणी आपको धैर्य, ज्ञान और हिम्मत दें।
जय माता दी!

