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	<title>hindu culture Archives - Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</title>
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		<title>जानिए होली के अजब-गजब टोटके, जो कि जीवन के हर संकट को रोके</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Sharleen Kaur]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Mar 2024 10:46:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>होली के अजब-गजब टोटके &#8211; हिन्दू पंचांग के अनुसार होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है। हिन्दू धर्म में यह त्यौहार दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिकादहन किया जाता है, होलिकादहन के दिन लकड़ी के ढेर की पूजा की जाती है और उसकी परिक्रमा की जाती है। दूसरे दिन होली वाले [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>होली के अजब-गजब टोटके &#8211;</strong> हिन्दू पंचांग के अनुसार होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है। हिन्दू धर्म में यह त्यौहार दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिकादहन किया जाता है, होलिकादहन के दिन लकड़ी के ढेर की पूजा की जाती है और उसकी परिक्रमा की जाती है। दूसरे दिन होली वाले दिन रंगों, अबीर और गुलाल से होली खेली जाती है, होली को धुलेंडी भी कहा जाता है।</p>
<p><img data-recalc-dims="1" fetchpriority="high" decoding="async" class=" wp-image-17526 aligncenter" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/Holi.jpg?resize=614%2C352&#038;ssl=1" alt="" width="614" height="352" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/Holi.jpg?w=400&amp;ssl=1 400w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/Holi.jpg?resize=300%2C172&amp;ssl=1 300w" sizes="(max-width: 614px) 100vw, 614px" /></p>
<p><strong><div class="read-also-wrap read-also-outer"><span class="read-also-link">संबंधित: </span> <a href="https://fundabook.com/astrology-holi-special-miraculous-tricks-2/">जानिए होली के अजब-गजब टोटके, जो कि जीवन के हर संकट को रोके</a> </div></strong></p>
<h2>होली 2024 तिथि</h2>
<p>हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा 24 मार्च को सुबह 9 बजकर 54 मिनट से प्रारंभ हो रही है, जो 25 मार्च को दोपहर 12 बजकर 29 मिनट पर समाप्त हो रही है। ऐसे में होलिका दहन 24 मार्च और रंगों वाली होली 25 मार्च को खेली जाएगी।</p>
<h2>होली के अजब-गजब टोटके</h2>
<p>आज हम आपको होली पर किए जाने वाले कुछ साधारण उपाय बता रहे हैं, ये उपाय बहुत ही जल्दी शुभ फल प्रदान करते हैं। आइए जानते हैं ये खास उपाय :</p>
<h2>रोग नाश के लिए उपाय</h2>
<p><em><strong>मंत्र- ॐ नमो भगवते रुद्राय मृतार्क मध्ये संस्थिताय मम शरीरं अमृतं कुरु कुरु स्वाहा।</strong></em></p>
<p>होली वाले दिन ऊपर दिए गए मंत्र का जाप तुलसी की माला से करें। अगर आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं, तो इस मंत्र का जाप करने से आपकी बीमारी दूर हो जाएगी।</p>
<h2>धन की कमी को दूर करने के उपाय</h2>
<p>होली की रात चंद्रमा के उदय होने के बाद अपने घर की छत पर या खुली जगह, जहां से चांद नज़र आए, वहां खड़े हो जाएं। फिर चंद्रमा का स्मरण करते हुए चांदी की प्लेट में सूखे छुहारे तथा कुछ मखाने रखकर शुद्ध घी के दीपक के साथ धूप एवं अगरबत्ती अर्पित करें।</p>
<p>अब दूध से चंद्रमा को अर्घ्य दें। अर्घ्य के बाद सफेद मिठाई तथा केसर मिश्रित साबूदाने की खीर अर्पित करें। चंद्रमा से समृद्धि प्रदान करने का निवेदन करें। बाद में प्रसाद और मखानों को बच्चों में बांट दें। फिर लगातार आने वाली प्रत्येक पूर्णिमा की रात चंद्रमा को दूध का अर्घ्य दें।</p>
<h2>शीघ्र विवाह के लिए उपाय</h2>
<p>होली के दिन सुबह एक साबुत पान पर साबुत सुपारी एवं हल्दी की गांठ शिवलिंग पर चढ़ाएं और पीछे पलटे बगैर अपने घर आ जाएं। यही प्रयोग अगले दिन भी करें। जल्दी ही आपके विवाह के योग बन सकते हैं।</p>
<h2>ग्रहों की शांति के लिए उपाय</h2>
<p><em><strong>मंत्र- ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरान्तकारी भानु शशि भूमि-सुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव: सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु।।</strong></em></p>
<p>होली की रात उत्तर दिशा में बाजोट (पटिया) पर सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर मूंग, चने की दाल, चावल, गेहूं, मसूर, काले उड़द एवं तिल की ढेरी बनाएं। अब उस पर नवग्रह यंत्र स्थापित करें। उस पर केसर का तिलक करें, घी का दीपक लगाएं और ऊपर दिए गए मंत्र मंत्र का जाप करें। जाप स्फटिक की माला से करें। जाप पूरा होने पर यंत्र को पूजा स्थान पर स्थापित करें, ग्रह अनुकूल होने लगेंगे।</p>
<h2>व्यापार में सफलता पाने का उपाय</h2>
<p><em><strong>मंत्र- ॐ श्रीं श्रीं श्रीं परम सिद्धि व्यापार वृद्धि नम:।</strong></em></p>
<p>एकाक्षी नारियल को लाल कपड़े में गेहूं के आसन पर स्थापित करें और सिन्दूर का तिलक करें। अब मूंगे की माला से ऊपर दिए गए मंत्र का जाप करें। 21 माला जाप होने पर इस पोटली को दुकान में ऐसे स्थान पर टांग दें, जहां ग्राहकों की नज़र इस पर पड़ती रहे। इससे व्यापार में सफलता मिलने के योग बन सकते हैं।</p>
<h2>होली की पूजा कैसे करें</h2>
<p>लकड़ी और कंडों की होली के साथ घास लगाकर होलिका खड़ी करके उसका पूजन करने से पहले हाथ में <strong>असद, फूल, सुपारी, पैसा</strong> लेकर पूजन कर जल के साथ होलिका के पास छोड़ दें और <strong>अक्षत, चंदन, रोली, हल्दी, गुलाल, फूल</strong> तथा <strong>गूलरी</strong> की माला पहनाएं।</p>
<p>इसके बाद होलिका की तीन परिक्रमा करते हुए नारियल का गोला, गेहूं की बाली तथा चना को भूंज कर इसका प्रसाद सभी को वितरित करें। होली की पूजा करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि, संतान प्राप्ति होती है।</p>
<p><strong><div class="read-also-wrap read-also-outer"><span class="read-also-link">संबंधित: </span> <a href="https://fundabook.com/astrology-holi-special/">आपको हर संकट से बचाएंगें, होली पर किए गए यह 7 अनोखे काम</a> </div></strong></p>
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		<title>होली पर इस चमत्कारी टोटके से घर में हमेशा के लिए ठहर जाएगी समृद्धि</title>
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		<dc:creator><![CDATA[अरविन्द कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Mar 2024 10:30:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>वैसे तो हर त्यौहार का अपना एक रंग और महत्व होता है, लेकिन हरे, पीले, लाल, गुलाबी आदि असल रंगों का त्यौहार होली बहुत ही महत्वपूर्ण है। होली के आते ही वातावरण में एक मस्ती का आलम छा जाता है। होली के दिन रंगों के माध्यम से सारी भिन्नताएं मिट जाती हैं और सब बस [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>वैसे तो हर त्यौहार का अपना एक रंग और महत्व होता है, लेकिन<strong> हरे, पीले, लाल, गुलाबी</strong> आदि असल रंगों का त्यौहार होली बहुत ही महत्वपूर्ण है। होली के आते ही वातावरण में एक मस्ती का आलम छा जाता है।</p>
<p>होली के दिन रंगों के माध्यम से सारी भिन्नताएं मिट जाती हैं और सब बस एक रंग के हो जाते हैं। हर किसी का तन-मन, प्रेम-उल्लास और उमंग के रंगों की फुहार से भर जाता है। आज हम आपको इस पोस्ट में एक टोटका बताने जा रहे हैं, जिससे घर में हमेशा के लिए समृद्धि ठहर जाती है।</p>
<p><img data-recalc-dims="1" decoding="async" class=" wp-image-17526 aligncenter" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/Holi.jpg?resize=673%2C385&#038;ssl=1" alt="" width="673" height="385" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/Holi.jpg?w=400&amp;ssl=1 400w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/Holi.jpg?resize=300%2C172&amp;ssl=1 300w" sizes="(max-width: 673px) 100vw, 673px" /></p>
<p><strong><div class="read-also-wrap read-also-outer"><span class="read-also-link">संबंधित: </span> <a href="https://fundabook.com/astrology-holi-special-miraculous-tricks-2/">जानिए होली के अजब-गजब टोटके, जो कि जीवन के हर संकट को रोके</a> </div></strong></p>
<h2>कब है होली</h2>
<p>हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा 24 मार्च को सुबह 9 बजकर 54 मिनट से प्रारंभ हो रही है, जो 25 मार्च को दोपहर 12 बजकर 29 मिनट पर समाप्त हो रही है। ऐसे में होलिका दहन 24 मार्च और रंगों वाली होली 25 मार्च को खेली जाएगी।</p>
<h2>क्यों मनाई जाती है होली</h2>
<p>हिन्दू मान्यताओं के अनुसार हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहते थे। उनकी इस भक्ति से उनके पिता हिरण्यकश्यप नाखुश थे, इसीलिए उनके पिता ने अपने पुत्र को भगवान की भक्ति से हटाने के लिए कई प्रयास किए।</p>
<p>हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जल सकेगी। एक बार हिरण्यकश्यप ने अपनी ही बहन होलिका के जरिए प्रह्लाद को जिंदा जला देने का आदेश दिया, लेकिन भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की।</p>
<p>जब होलिका प्रह्लाद को जलाने के लिए आग में बैठी, तो वह खुद जल कर मर गई। तभी से इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में जाना जाता है और हिन्दू धर्म में होलिका दहन की परंपरा प्रचलित है। होलिका दहन से अगले दिन दुलहंडी (होली) खेला जाता है।</p>
<h2>होली का मटकी टोटा</h2>
<p>जिस स्थान पर होली जलाई जाती रही हो, वहां पर होली जलने से एक दिन पहले की रात में एक मटकी में गाय का घी, तिल का तेल, गेहूं और ज्वार तथा एक तांबे का पैसा रखकर मटकी का मुंह बंद करके गाड़ आएं।</p>
<p>रात्रि में जब होली जल जाए, तब दूसरे दिन सुबह उसे उखाड़ लाएं। फिर यह सारी वस्तुएं पोटली में बांधकर जिस जगह रख दी जाएगी, वहां समृद्धि रूक जाएगी। घर में फिर किसी चीज की कभी कमी नहीं होगी।</p>
<h2>होली पूजन विधि</h2>
<p>लकड़ी और कंडों की होली के साथ घास लगाकर होलिका खड़ी करके उसका पूजन करने से पहले हाथ में असद, फूल, सुपारी, पैसा लेकर पूजन कर जल के साथ होलिका के पास छोड़ दें और अक्षत, चंदन, रोली, हल्दी, गुलाल, फूल तथा गूलरी की माला पहनाएं।</p>
<p>इसके बाद होलिका की तीन परिक्रमा करते हुए नारियल का गोला, गेहूं की बाली तथा चना को भूंज कर इसका प्रसाद सभी को वितरित करें। होली की पूजा करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि, संतान प्राप्ति होती है।</p>
<p><strong><div class="read-also-wrap read-also-outer"><span class="read-also-link">संबंधित: </span> <a href="https://fundabook.com/easy-and-accurate-tricks-of-attaining-lakshmi/">लक्ष्मी व धन लाभ प्राप्ति के आसान व अचूक टोटके</a> </div></strong></p>
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		<title>एक रहस्यमयी मंदिर जिसका दरवाज़ा खुलता है सिर्फ महाशिवरात्रि पर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Mamta Bansal]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 07 Feb 2024 10:40:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>भारत में कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक शिव मंदिर है, जिनके दर्शन करने हर साल लाखों की तादाद में भक्त पहुंचते हैं। भारत में कई शिव मंदिर ऐसे भी हैं,जहां तक पहुँचने के लिए भक्तों को काफी दुर्गम यात्रा भी करनी होती है। आज हम आपको भगवान शिव के ऐसे रहस्यमयी मंदिर के बारे [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://fundabook.com/a-mysterious-temple-whose-door-opens-only-on-mahashivaratri/">एक रहस्यमयी मंदिर जिसका दरवाज़ा खुलता है सिर्फ महाशिवरात्रि पर</a> appeared first on <a href="https://fundabook.com">Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक <a href="https://fundabook.com/ancient-temple/">शिव मंदिर</a> है, जिनके दर्शन करने हर साल लाखों की तादाद में भक्त पहुंचते हैं। भारत में कई शिव मंदिर ऐसे भी हैं,जहां तक पहुँचने के लिए भक्तों को काफी दुर्गम यात्रा भी करनी होती है।</p>
<p>आज हम आपको भगवान शिव के ऐसे रहस्यमयी मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां मत्था टेकने के लिए पूरे साल इंतजार करना पड़ता है। एक ऐसा मंदिर जो साल में सिर्फ एक बार खुलता है।</p>
<p>हम बात कर रहे हैं, <strong>जयपुर</strong> स्थित <strong>एकलिंगेश्वर महादेव मंदिर</strong> की, जो साल में सिर्फ शिवरात्रि के दिन ही खुलता है। इसे शंकर गढ़ी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।</p>
<p><img data-recalc-dims="1" decoding="async" class="wp-image-17425 size-full aligncenter" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/jaipur.jpg?resize=500%2C357&#038;ssl=1" alt="" width="500" height="357" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/jaipur.jpg?w=500&amp;ssl=1 500w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/jaipur.jpg?resize=300%2C214&amp;ssl=1 300w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/jaipur.jpg?resize=100%2C70&amp;ssl=1 100w" sizes="(max-width: 500px) 100vw, 500px" /></p>
<p><strong><div class="read-also-wrap read-also-outer"><span class="read-also-link">संबंधित: </span><a href="https://fundabook.com/mahadev-is-pleased-with-these-14-auspicious-flowers/">महाशिवरात्रि पर इन 14 फूलों से करें महादेव को प्रसन्न</a></div></strong></p>
<p>जयपुर में मोतीडूंगरी शंकरगढ़ की पहाड़ी स्थित एकलिंगजी और चांदनी चौक के राज-राजेश्वर मंदिर ऐसे दो मंदिर है जो वर्ष में सिर्फ एक बार खुलते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर ही यहां श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन होते हैं। यही कारण है कि यहां अलसुबह से भक्तों का तांता लगना शुरू हो जाता है।</p>
<p>जयपुर का यह मंदिर बिरला मंदिर के पीछे मोती डूंगरी के पास शिवडूंगरी पर स्थित है। इस मंदिर के पुजारी ने बताया कि इसकी स्थापना बहुत पुरानी है। यह जयपुर की स्थापना से भी पहले बनाया गया था। शिवरात्रि के दिन ही इसके पट आम भक्तों के लिए खुलते हैं।</p>
<p>यह महादेव मंदिर जयपुर राज परिवार का निजी मंदिर है और इस मंदिर में खुद जयपुर के महाराजा और महारानियां पूजा-अर्चना करने आते थे। खुद जयपुर की राजमाता गायत्री देवी तक कई बार यहाँ महादेव की पूजा करने पहुँचती थीं। आमजन को सालभर शिवरात्रि का ही इंतजार करना पड़ता है जब मंदिर के पट खुलते हैं और उन्हें एकलिंग जी के दर्शन होते है।</p>
<p>इस मंदिर में पहले शिव भगवान के साथ माता पार्वती और उनके पुत्र गणेश की मूर्ति की स्थापना की गयी थी, लेकिन कुछ समय बाद वह मूर्तियां अपने आप गायब हो गयी थी, लेकिन फिर से मूर्तियों की स्थापना की गयी, जो एक बार फिर से विचित्र तरीके से विलुप्त हो गयीं। जिसके बाद किसी ने भी दुबारा मंदिर में भगवान शंकर के अलावा किसी भी मूर्ति की स्थापना करने का साहस नहीं किया।</p>
<p>सावन के महीने में या किसी बड़े पारिवारिक कार्यक्रम में राज परिवार के सदस्य यहां पूजा-पाठ करने पहुंचते हैं। इस मंदिर से जुड़े सभी खर्च शाही परिवार द्वारा वहन किए जाते हैं।</p>
<p>चूंकि यह मंदिर साल में एक ही बार खुलता है इसलिए शिवरात्रि के दिन इसके प्रति श्रद्धालुओं में विशेष आकर्षण होता है। करीब एक किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ कर एवं कई घंटों तक लाइन में खड़े होकर लोग यहां भगवान के दर्शन करते हैं।</p>
<p><strong><div class="read-also-wrap read-also-outer"><span class="read-also-link">संबंधित: </span> <a href="https://fundabook.com/perfect-remedies-to-please-mahadev-on-mahashivaratri/">महाशिवरात्रि पर महादेव को प्रसन्न करने के अचूक उपाय</a> </div></strong></p>
<p>The post <a href="https://fundabook.com/a-mysterious-temple-whose-door-opens-only-on-mahashivaratri/">एक रहस्यमयी मंदिर जिसका दरवाज़ा खुलता है सिर्फ महाशिवरात्रि पर</a> appeared first on <a href="https://fundabook.com">Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</a>.</p>
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		<title>जानिए कब है अहोई अष्टमी,  शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा की विधि !!!</title>
		<link>https://fundabook.com/when-ahoi-ashtami-celebrated-auspicious-time-importance-method-worship/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Sharleen Kaur]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 27 Oct 2023 11:25:27 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[अहोई अष्टमी]]></category>
		<category><![CDATA[रोचक तथ्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन रखा जाता है। करवा चौथ के व्रत की तरह ही यह व्रत भी निर्जल रहकर रखने का विधान वर्णित है। अहोई अष्टमी का त्यौहार हिंदू धर्म में बहुत ही खास माना गया है क्योंकि अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं संतान की [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन रखा जाता है। <a href="https://fundabook.com/karva-chauth-the-time-of-worship-and-worship-2023/">करवा चौथ</a> के व्रत की तरह ही यह व्रत भी निर्जल रहकर रखने का विधान वर्णित है।</p>
<p>अहोई अष्टमी का त्यौहार हिंदू धर्म में बहुत ही खास माना गया है क्योंकि अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना से रखती हैं।</p>
<p>वहीं जो महिलाएं संंतान प्राप्ति की चाह रखती हैं उनके लिए भी <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%88_%E0%A4%85%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A5%80" target="_blank" rel="noopener noreferrer">अहोई अष्टमी</a> का व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण और फलदायी माना गया है।  इस साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है।</p>
<p><img data-recalc-dims="1" loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-20206 size-full" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/10/ahoi-ashtami.jpg?resize=600%2C450&#038;ssl=1" alt="Ahoi Ashtami" width="600" height="450" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/10/ahoi-ashtami.jpg?w=600&amp;ssl=1 600w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/10/ahoi-ashtami.jpg?resize=300%2C225&amp;ssl=1 300w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/10/ahoi-ashtami.jpg?resize=80%2C60&amp;ssl=1 80w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/10/ahoi-ashtami.jpg?resize=265%2C198&amp;ssl=1 265w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/10/ahoi-ashtami.jpg?resize=560%2C420&amp;ssl=1 560w" sizes="auto, (max-width: 600px) 100vw, 600px" /></p>
<h3>अहोई अष्टमी के शुभ मुहूर्त</h3>
<p>पंचांग के अनुसार इस साल यह तिथि 4 नवंबर की मध्यरात्रि को शुरू होगी और 5 नवंबर की रात 3 बजकर 19 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत 5 नवंबर को रखा जाएगा।</p>
<p>अहोई अष्टमी के दिन पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 33 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 52 मिनट तक रहेगा। चूंकि यह व्रत तारों को देखने के बाद खोलते हैं। ऐसे में तारों के दर्शन के लिए मुहूर्त शाम 5 बजकर 58 मिनट है।</p>
<h3>अहोई अष्टमी का महत्व</h3>
<p>माताओं के लिए कार्तिक मास की अष्टमी तिथि बहुत ही खास होती है क्योंकि इस दिन अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। माताएं यह व्रत संतान की लंबी उम्र और बेहतर स्वास्थ्य के लिए रखती हैं।</p>
<p>इस दिन अहोई माता का पूजन किया जाता है और दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद रात्रि में तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करते हैं। कहते हैं कि अहोई अष्टमी का व्रत रखने से बच्चों पर आने वाले सभी संकट दूर होते हैं और उन्हें जीवन में तरक्की मिलती है।</p>
<p>वहीं जो महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना रखती हैं उनके लिए भी अहोई का व्रत बहुत ही फलदायी माना गया है। इस व्रत को रखने से संतान प्राप्ति की कामना पूरी होती है।</p>
<h3>ऐसे करें अहोई माता की पूजा</h3>
<ul>
<li>सुबह के समय जल्दी उठकर सबसे पहले स्नान आदि करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।</li>
<li>अब मंदिर की दीवार पर गेरू और चावल से अहोई माता यानी कि मां पार्वती और स्याहु व उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं। आप चाहें तो बाज़ार में मिलने वाले पोस्टर का इस्तेमाल भी कर सकती हैं।</li>
<li>अब एक नए मटके में पानी भरकर रखें, उस पर हल्दी से स्वास्तिक बनाएं, अब मटके के ढक्कन पर सिंघाड़े रखें।</li>
<li>घर में मौजूद सभी बुजुर्ग महिलाओं को बुलाकर सभी के साथ मिलकर अहोई माता का ध्यान करें और उनकी व्रत कथा पढ़ें। सभी के लिए एक-एक नया परिधान भी रखें। कथा खत्म होने के बाद परिधान को उन महिलाओं को भेंट कर दें।</li>
<li>रखे हुए मटके का पानी खाली ना करें इस पानी से दीवाली के दिन पूरे घर में पोंछा लगाएं। इससे घर में बरकत आती है।</li>
<li>रात के समय सितारों को जल से अर्घ्य दें और फिर ही उपवास को खोलें।</li>
</ul>
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		<title>पितृ पक्ष 29 सितम्बर से 14 अक्टूबर तक, किस तिथि पर किसका श्राद्ध करना चाहिए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Sharleen Kaur]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Sep 2023 06:11:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म-संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[लाइफ]]></category>
		<category><![CDATA[hindu culture]]></category>
		<category><![CDATA[Hindu religion]]></category>
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		<category><![CDATA[अशुभ]]></category>
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		<category><![CDATA[पूर्वज]]></category>
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		<category><![CDATA[श्राद्ध]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदू धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए संतान का होना जरुरी माना जाता हैl श्राद्ध की तिथियों में लोग अपने पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करते है और उन्हें जल और पिंड दान देते हैं। कौन [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए संतान का होना जरुरी माना जाता हैl श्राद्ध की तिथियों में लोग अपने पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करते है और उन्हें जल और पिंड दान देते हैं।</p>
<h2>कौन कहलाते हैं पितर</h2>
<p>पितर वे व्यक्ति कहलाते है, जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है, उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है।</p>
<h2>श्राद्ध क्या होता है</h2>
<p>हिन्दू धर्म में भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि से आरम्भ होने वाले <a href="https://fundabook.com/amazing-facts-about-human-life-and-body/">पितर</a> पक्ष का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा ही चुकाया जा सकता है। पितर पक्ष में श्राद्ध करने से पितर गण प्रसन्न रहते हैं। श्राद्ध में पितरों को उम्मीद रहती है, कि हमारे पुत्र-पौत्रादि पिंडदान और तिलांजलि प्रदान करेंगे। हिंदू धर्म शास्त्रों में पितर पक्ष में श्राद्ध अवश्य करने के लिए कहा गया है।</p>
<h2><img data-recalc-dims="1" loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-19537" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/09/shradh-finel.jpg?resize=600%2C407&#038;ssl=1" alt="" width="600" height="407" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/09/shradh-finel.jpg?w=600&amp;ssl=1 600w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/09/shradh-finel.jpg?resize=300%2C204&amp;ssl=1 300w" sizes="auto, (max-width: 600px) 100vw, 600px" /></h2>
<h2>कब से शुरू हो रहे है श्राद्ध</h2>
<p>इस वर्ष में श्राद्ध पक्ष 29 सितम्बर से 14 अक्टूबर तक तक रहेगें । पूर्णिमा से अमावस्या तक 15 तिथियां पितरों के निमित श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन 15 तिथियों में सभी अपने-अपने पितर को याद करते है और उनका श्राद्ध करते हैं।</p>
<p><strong>पूर्णिमा, 29 सितंबर</strong><br />
जिन लोगों की मृत्यु पूर्णिमा को हुई हो, उनका श्राद्ध इस दिन करना चाहिए। इस तिथि से पितर पक्ष शुरू होता है।<br />
<strong>प्रतिपदा</strong><strong>, 30 </strong><strong>सितंबर</strong><br />
इस तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी महीनें के किसी भी पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर हुई हो। जैसे  नाना-नानी के परिवार में किसी की मृत्यु हुई हो, और उसकी मृत्यु की तारीख पता न हो, तो उसका श्राद्ध प्रतिपदा पर किया जाता है।<br />
<strong>द्वितिया</strong><strong>, 1 अक्टबर </strong><br />
द्वितिया तिथि को मृत लोगों का श्राद्ध किया जाता है।<br />
<strong>तृतीया</strong><strong>, 2 अक्टूबर</strong><br />
जिसकी मृत्यु तृतीया तिथि पर हुई हो, उसका श्राद्ध इस दिन किया जाता है। इस बार दो दिन तृतीया तिथि रहेगी।<br />
<strong>चतुर्थी</strong><strong>, 3 अक्टूबर</strong><br />
इस तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु चतुर्थी तिथि को हुई हो।<br />
<strong>पंचमी</strong><strong>, 4 अक्टूबर</strong><br />
पंचमी तिथि पर मृत व्यक्ति का श्राद्ध किया जाता है। और अगर किसी अविवाहित व्यक्ति की मृत्यु पंचमी तिथि को हुई है, तो उसका श्राद्ध  भी इस तिथि पर करना चाहिए।<br />
<strong>षष्ठी</strong><strong>, 5 अक्टूबर</strong><br />
षष्ठी तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु षष्ठी तिथि पर हुई हो।<br />
<strong>सप्तमी</strong><strong>, 6 अक्टूबर</strong><br />
जिस व्यक्ति की मृत्यु किसी भी महीनें और किसी भी पक्ष मे हुई हो , उसका श्राद्ध इस तिथि पर किया जाता है।<br />
<strong>अष्टमी</strong><strong>, 7 </strong><strong>अक्टूबर</strong><br />
जिन लोगों का देहांत किसी माह की अष्टमी तिथि पर हुई है, उनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है।<br />
<strong>नवमी</strong> <b>, 8 <strong>अक्टूबर</strong></b><br />
माता की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध न करके नवमी तिथि पर उनका श्राद्ध करना चाहिए. ऐसा माना जाता है कि, नवमी तिथि को माता का श्राद्ध करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती हैं. वहीं जिन महिलाओं की मृत्यु तिथि याद न हो उनका श्राद्ध भी नवमी तिथि को किया जा सकता है ।<br />
<strong>दशमी,  9 अक्टूबर</strong><br />
दशमी तिथि को जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध महालय की दसवीं तिथि के दिन किया जाता है.<br />
<strong>एकादशी</strong><strong>, 10 <span id="35_TRN_1">अक्टूबर</span></strong><br />
इस तिथि पर मृत लोगों का और संन्यासियों का श्राद्ध किया जाता है।<br />
<strong>द्वादशी</strong><strong>,11 <span id="35_TRN_1">अक्टूबर</span> </strong><br />
इस दिन मृत लोगों का श्राद्ध द्वादशी तिथि पर किया जाता है।<br />
<strong>त्रयोदशी</strong><strong>, 12 <span id="35_TRN_1">अक्टूबर</span></strong><br />
अगर किसी बच्चे की मौत हो गई है तो उसका श्राद्ध इस तिथि पर करना चाहिए।<br />
<strong>चतुर्दशी</strong><strong>, 13 <span id="35_TRN_1">अक्टूबर</span></strong><br />
जिन लोगों की मौत किसी दुर्घटना में हो गई है, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि पर करना चाहिए।<br />
<strong>अमावस्या</strong><strong>, 14 <span id="35_TRN_1">अक्टूबर</span></strong><br />
सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के लिए मोक्ष अमावस्या का श्राद्ध करना चाहिए।</p>
<h2>पितर पक्ष में कैसे करें श्राद्ध</h2>
<p>श्राद्ध पक्ष के दिनों में पूजा और तर्पण करें। पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक ग्रास गाय, दूसरा हिस्सा कुत्ते, तीसरा टुकड़ा कौए और एक भाग मेहमान के लिए रख दें। गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। जो श्रद्धा पूर्वक किया जाएं उसे श्राद्ध कहते हैं।</p>
<p>पुराणों के अनुसार मनुष्य का अगला जीवन पिछले संस्कारों से बनता है। श्राद्ध कर्म इस भावना से किया जाता है, कि अगला जीवन बेहतर हो। जिन पितरों का हम श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे हमारी मदद करते हैं।</p>
<h2>पितर पक्ष में नई वस्‍तुओं की खरीदारी शुभ या अशुभ, जानिए क्या हैं मान्यताएं</h2>
<p>श्राद्ध पक्ष को लेकर लोगों के मन में आम तौर पर यह <a href="http://list-of-clowns-that-will-give-you-nightmares" target="_blank" rel="noopener noreferrer">धारणा</a> बनी हुई है, कि यह अशुभ समय होता है और इस दौरान कोई भी नया काम करने या कोई भी नई चीज खरीदना शुभ नहीं माना जाता। ऐसा करने से पितरगण नाराज हो जाते हैं।</p>
<p>यही वजह है कि इस धारणा के कई व्‍यापार और उद्योग पितर पक्ष के दिनों में मंदे पड़ जाते हैं। वहीं  शास्‍त्रों में इस बात का उल्‍लेख कहीं नहीं मिलता है, कि पितर पक्ष में खरीदारी करने से अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं l</p>
<p>कुछ विद्वानों का मानना है कि पितर पक्ष में हमारे पूर्वज धरती का रुख करते हैं। ऐसे में हमें उनकी सेवा में और श्राद्ध कर्म में मन लगाना चाहिए। सेवा करने की बजाए यदि हम नई वस्तुओं की और ध्यान लगाए तो पितृ नाराज हो सकते हैं l यही वजह है कि पितृ पक्ष में नई वस्‍तु नहीं खरीदी जाती।</p>
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		<title>कब है जन्माष्टमी और क्या है इसका महत्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Mamta Bansal]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 Sep 2023 10:51:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म-संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[लाइफ]]></category>
		<category><![CDATA[culture]]></category>
		<category><![CDATA[hindu culture]]></category>
		<category><![CDATA[Hindu religion]]></category>
		<category><![CDATA[human life]]></category>
		<category><![CDATA[life]]></category>
		<category><![CDATA[Religion]]></category>
		<category><![CDATA[जन्माष्टमी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन मनाई जाती है। इस दिन भगवान कृष्ण के बाल गोपाल स्वरूप की पूजा की जाती है। भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में यह पर्व देशभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कृष्ण जन्मोत्सव के दिन लोग व्रत रखते हैं और [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://fundabook.com/janmashtami-and-what-is-its-importance-hindi/">कब है जन्माष्टमी और क्या है इसका महत्व</a> appeared first on <a href="https://fundabook.com">Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन मनाई जाती है। इस दिन भगवान कृष्ण के बाल गोपाल स्वरूप की पूजा की जाती है।</p>
<p>भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में यह पर्व देशभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कृष्ण जन्मोत्सव के दिन लोग व्रत रखते हैं और रात में 12 बजे कान्हा के जन्म के बाद उनकी पूजा करके व्रत का पारण करते हैं। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल गोपाल स्वरूप की पूजा की जाती है।</p>
<p>ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से भगवान श्री कृष्ण सभी मुरादें शीघ्र पूर्ण कर देते हैं। वहीं महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना के साथ यह व्रत करती हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल को प्रसन्न करने के लिए कई तरह के पकवान अर्पित किए जाते हैं। उन्हें झूला झुलाया जाता है। ऐसे में चलिए जानते हैं साल 2023 में कृष्ण जन्माष्टमी कब है-</p>
<p><img data-recalc-dims="1" loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-22519 size-full" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2020/08/janmashtami-1.jpg?resize=600%2C399&#038;ssl=1" alt="" width="600" height="399" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2020/08/janmashtami-1.jpg?w=600&amp;ssl=1 600w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2020/08/janmashtami-1.jpg?resize=300%2C200&amp;ssl=1 300w" sizes="auto, (max-width: 600px) 100vw, 600px" /></p>
<h2>कृष्ण जन्माष्टमी 2023 कब है?</h2>
<p><strong> </strong>पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 6 सितंबर 2023 को दोपहर 03 बजकर 37 मिनट से हो रही है। वहीं इस तिथि का समापन अगले दिन 7 सितंबर 2023 शाम 04 बजकर 14 मिनट पर होगा।</p>
<h2>जन्माष्टमी का महत्व</h2>
<p>श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है और इसे हिंदुओं के प्रमुख <a href="https://fundabook.com/most-bizarre-festivals-in-the-world/">त्यौहारों</a> में से एक माना जाता है।</p>
<p>माना जाता है कि सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में आंठवा अवतार लिया था। देश के सभी राज्यों में अलग-अलग तरीके से इस त्यौहार को मनाया जाता है।</p>
<p>इस दिन बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी लोग अपनी श्रद्धानुसार दिनभर व्रत रखते हैं और भगवान कृष्ण की महिमा का गुणगान करते हैं। दिनभर घरों और मंदिरों में भगवान कृष्ण के भजन कीर्तन चलते हैं वहीं मंदिरों में झांकियां भी निकाली जाती हैं।</p>
<h2>पूजन विधि</h2>
<ul>
<li><span style="font-weight: 400;">सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। घर के मंदिर में साफ- सफाई करें।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;">घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;">सभी देवी-देवताओं का जलाभिषेक करें।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;">इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप यानी लड्डू गोपाल की पूजा की जाती है।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;">लड्डू </span><span style="font-weight: 400;">गोपाल का जलाभिषेक करें।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;">इस दिन लड्डू गोपाल को झूले में बैठाएं।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;">लड्डू गोपाल को झूला झूलाएं।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;">अपनी इच्छानुसार लड्डू गोपाल को भोग लगाएं। इस बात का ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;">लड्डू गोपाल की सेवा पुत्र की तरह करें।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;">इस दिन रात्रि पूजा का महत्व होता है, क्योंकि भगवान श्री कृष्ण का जन्म रात में हुआ था।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> लड्डू गोपाल को मिश्री, मेवा का भोग भी लगाएं। लड्डू गोपाल की आरती करें।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;">इस दिन अधिक से अधिक लड्डू गोपाल का ध्यान रखें। </span></li>
</ul>
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		<title>जन्माष्टमी: कब और कैसे करें जन्माष्टमी व्रत</title>
		<link>https://fundabook.com/how-when-janamasthami-fasting/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[अरविन्द कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 Sep 2023 09:53:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म-संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[culture]]></category>
		<category><![CDATA[fasting]]></category>
		<category><![CDATA[hindu]]></category>
		<category><![CDATA[hindu culture]]></category>
		<category><![CDATA[Hindu religion]]></category>
		<category><![CDATA[janamashtmi]]></category>
		<category><![CDATA[Religion]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जन्माष्टमी हिन्दू धर्म में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। इस पर्व को बाल-गोपाल श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पूरी श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। हर साल हिन्दू कैलेंडर के भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>जन्माष्टमी हिन्दू धर्म में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। इस पर्व को बाल-गोपाल श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पूरी श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है।</p>
<p>हर साल हिन्दू कैलेंडर के भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। हिन्दू धर्म की मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म पांच हजार साल पहले भाद्रपद मास में रोहिणी नक्षत्र में अष्टमी तिथि की आधी रात को हुआ था।</p>
<h2><img data-recalc-dims="1" loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-19072" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/08/janamashtmi-fasting-how-when.jpg?resize=660%2C411&#038;ssl=1" alt="जन्माष्टमी" width="660" height="411" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/08/janamashtmi-fasting-how-when.jpg?w=660&amp;ssl=1 660w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/08/janamashtmi-fasting-how-when.jpg?resize=300%2C187&amp;ssl=1 300w" sizes="auto, (max-width: 660px) 100vw, 660px" />कब है जन्माष्टमी व्रत</h2>
<p>इस साल 2023 को स्मार्त यानि गृहस्थियों के लिए जन्माष्टमी व्रत 6 सितम्बर को है l परंपरा के अनुसार अष्टमी की आधी रात के बाद ही भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद पूजा की जाती है।</p>
<p>इस दिन व्रतानुष्ठान अष्टमी तिथि से शुरू होती है और अगले दिन नवमी पर खत्म होती है। फिर भी कई लोग, अर्द्धरात्रि पर रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी और अष्टमी पर व्रत रखते हैं। कुछ भक्तगण उदयव्यापिनी अर्थात शुरू होती अष्टमी पर उपवास करते हैं।</p>
<p>शास्त्रकारों ने व्रत -पूजन, जपादि के लिए अर्द्धरात्रि अर्थात अष्टमी और नवमी के बीच की रात्रि में रहने वाली तिथि को ही मान्यता दी है।</p>
<p>विशेषकर स्मार्त लोग अर्द्धरात्रिव्यापिनी अष्टमी को यह व्रत करते हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, चंडीगढ़ आदि में में स्मार्त धर्मावलम्बी अर्थात गृहस्थ लोग इसी परम्परा का अनुसरण करते हुए सप्तमी युक्ता अर्द्धरात्रिकालीन वाली अष्टमी को व्रत, पूजा आदि करते आ रहे हैं जबकि मथुरा, वृंदावन सहित उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में उदयकालीन अष्टमी के दिन ही कृष्ण जन्मोत्सव मनाते आ रहे हैं।</p>
<p>भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली <a href="http://www.uptourism.gov.in/post/hi/mathura-vrindawan" target="_blank" rel="noopener noreferrer">मथुरा</a> की परम्परा को आधार मानकर मनाई जाने वाली जन्माष्टमी के दिन ही केन्द्रीय सरकार अवकाश की घोषणा करती है। वैष्णव संप्रदाय के अधिकांश लोग उदयकालिक नवमी युता जन्माष्टमी व्रत के लिए ग्रहण करते हैं।</p>
<h2>कैसे करें जन्माष्टमी व्रत</h2>
<p>व्रत अष्टमी तिथि से शुरू होता है। इस दिन सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद घर के मंदिर को साफ सुथरा करें और जन्माष्टमी की तैयारी शुरू करें।</p>
<p>रोज की तरह पूजा करने के बाद बाल कृष्ण लड्डू गोपाल जी की मूर्ति मंदिर में रखें और इसे अच्छे से सजाएं। माता देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा जी का चित्र भी लगा सकते हैं।</p>
<p>इसके बाद, जप-ध्यान व व्रतानुष्ठान करके &#8216;ओम नमो भगवते वासुदेवाय&#8217; मंत्र जाप करें। पूरा दिन व्रत रखें। फलाहार कर सकते हैं। इसके साथ ही यथा संभव भगवान का भजन-कीर्तन, स्वाध्यान, पाठ व भगवान से संबन्धित प्रसंगों का अध्ययन व सेवन करें।</p>
<p>मन और वाणी को संयम में रखें। काम, क्रोध, लोभ, द्वेष, हिंसा, क्लेश, दुर्वचन, ठेस लगाना आदि अप्रिय कार्यों और मांस-मदिरा आदि दुर्व्यसनों से दूर रहने का अभ्यास करना ही उपवास है। इसके लिए <a href="https://fundabook.com/learn-how-to-meditate/">ध्यान करें</a>। उपवास केवल अन्न से सिद्ध नहीं होता बल्कि यह क्रिया-कलापों और आचरण से भी परिलक्षित होना अनिवार्य है।</p>
<h2>जन्माष्टमी पर मंत्र साधना</h2>
<p><strong>भगवान कृष्ण की आराधना</strong> के लिए आप यह मंत्र पढ़ सकते हैं</p>
<p><strong><em>ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्त ज्योतिशां पते!<br />
</em><em>नमस्ते रोहिणी कान्त अध्य मे प्रतिगृह्यताम्!!</em></strong></p>
<p><strong>संतान प्राप्ति के लिए:</strong> संतान की इच्छा रखने वाले दंपति, संतान गोपाल मंत्र का जाप पति-पत्नी दोनों मिलकर करें।</p>
<p><em>देवकीसुत गोविंद वासदेव जगत्पते!<br />
</em><em>देहिमे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:!! दूसरा मंत्र:<br />
</em><em>क्लीं ग्लौं श्यामल अंगाय नमः!!</em></p>
<p><strong>विवाह में हो रहे विलम्ब के लिए</strong>:</p>
<p><strong><em>ओम् क्ली कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।</em></strong></p>
<p>इन मंत्रों की एक माला अर्थात 108 मंत्र कर सकते हैं।</p>
<h2>जन्माष्टमी व्रत यानि व्रतराज</h2>
<p>कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूजन के साथ-साथ व्रत रखना बहुत फलदायी माना जाता है। इसे व्रत व्रतराज भी कहा जाता है। इस व्रत का विधि-विधान से पालन करने से कई गुना पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत सबसे आसान व्रत कहा जा सकता है जिसमें फलाहार, उबले आलू, साबुदाना आदि का सेवन किया जा सकता है।</p>
<h2>रात्रि बारह बजे तक व्रत का पालन</h2>
<p>जन्माष्टमी का व्रत रात बारह बजे तक किया जाता है। इस व्रत को करने वाले रात बारह बजे तक कृष्ण जन्म का इंतजार करते हैं। उसके पश्चात् पूजा आरती होती है और फिर प्रसाद मिलता है। प्रसाद के रूप में धनिया और माखन मिश्री दिया जाता है क्योंकि ये दोनों ही वस्तुएं श्री कृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं। उसके पश्चात् प्रसाद ग्रहण करके व्रत पारण किया जा सकता है। हालांकि सभी के यहां परम्पराएं अलग-अलग होती हैं। कोई प्रात:काल सूर्योदय के बाद व्रत पारण करते हैं तो कोई रात में प्रसाद खाकर व्रत खोल लेते हैं। आप अपने परिवार की परम्परा के अनुसार ही व्रत पारण करें।।</p>
<p>दिन भर अन्न ग्रहण नहीं करें। मध्य रात्रि को एक बार फिर पूजा की तैयारी शुरू करें। रात को 12 बजे भगवान के जन्म के बाद भगवान की पूजा करें और भजन करें। गंगा जल से श्री कृष्ण को स्नान कराएं और उन्हें सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाएं। भगवान को झूला झुलाएं और फिर भजन, गीत-संगीत के बाद प्रसाद का वितरण करें।</p>
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		<title>रक्षाबन्धन : 30 या 31 अगस्त, कब बांधी जाएगी भाई को राखी, जाने इस पोस्ट के माध्यम से</title>
		<link>https://fundabook.com/raksha-bandhan-festival-date-time-2023/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[अरविन्द कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Aug 2023 05:32:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म-संस्कृति]]></category>
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		<category><![CDATA[hindu]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रक्षाबन्धन एक हिन्दू व जैन त्यौहार  है जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। राखी ईश्वर की ओर से बांधा जाने वाला साक्षात सुरक्षा कवच है।  रक्षाबन्धन का पर्व भाई-बहनों के आपसी प्रेम का प्रतीक है। रक्षाबंधन पर बहनें अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांधती हैं। मुहूर्त शास्त्र के अनुसार [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-weight: 400;"><a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8" target="_blank" rel="noopener noreferrer"><b>रक्षाबन्धन</b></a> एक हिन्दू व जैन त्यौहार  है जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। राखी ईश्वर की ओर से बांधा जाने वाला साक्षात सुरक्षा कवच है। </span></p>
<p>रक्षाबन्धन का पर्व भाई-बहनों के आपसी प्रेम का प्रतीक है। रक्षाबंधन पर बहनें अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांधती हैं। मुहूर्त शास्त्र के अनुसार रक्षाबन्धन का त्योहार हमेशा भद्रा रहित काल में मनाना शुभ होता है। अगर रक्षाबंधन के दिन भद्रा होती है तो ऐसे में बहनों को अपने भाईयों की कलाई में राखी नहीं बांधनी चाहिए।</p>
<p>भद्रा की समाप्ति के बाद ही राखी बांधना चाहिए। इस बार रक्षा बंधन की तिथि  को लेकर कुछ मतभेद है। दरअसल इस वर्ष श्रावण माह की पूर्णिमा तिथि पर भद्रा का साया रहने के कारण रक्षाबंधन 30 और 31 अगस्त को मनाने को लेकर असमंजस बना हुआ है।</p>
<p>जानते हैं रक्षाबंधन का त्योहार 30 या 31 अगस्त कब मनाएं और शुभ महूर्त :-</p>
<p><img data-recalc-dims="1" loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-54699 size-full" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/08/Raksha-Bandhan-date-time-2023.webp?resize=696%2C450&#038;ssl=1" alt="" width="696" height="450" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/08/Raksha-Bandhan-date-time-2023.webp?w=768&amp;ssl=1 768w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/08/Raksha-Bandhan-date-time-2023.webp?resize=300%2C194&amp;ssl=1 300w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/08/Raksha-Bandhan-date-time-2023.webp?resize=150%2C97&amp;ssl=1 150w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/08/Raksha-Bandhan-date-time-2023.webp?resize=696%2C450&amp;ssl=1 696w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /></p>
<h2>रक्षाबन्धन का महत्व</h2>
<p>रक्षाबन्धन पर्व को भाई-बहन के प्रेम और सदभाव के पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है इसके बदले में भाई बहन को भेंट देता है एवं सदैव उसकी रक्षा करने का वचन भी देता है। अच्छे मुहूर्त अथवा भद्रारहित काल में भाई की कलाई में राखी बांधने से भाई को कार्य सिद्धि और विजय प्राप्त होती है।</p>
<h2>रक्षाबन्धन के दौरान कब पड़ रही है भद्रा काल ?</h2>
<p>इस साल भद्रा काल होने के कारण रक्षाबन्धन  का मुहूर्त  30 अगस्त को है या 31 को। इसको लेकर सभी असमंजस में है। इस साल पूर्णिमा तिथि 30 अगस्त को सुबह 10:58 मिनट से शुरू होगी, जो 31 अगस्त 2023 को सुबह 07:05 तक चलेगी।</p>
<p>लेकिन शास्त्रों  के अनुसार पूर्णिमा के साथ ही भद्राकाल भी शुरू हो जाएगा। इसमें हिन्दू पंचांग के अनुसार राखी बांधना शुभ नहीं रहता है। ऐसे में एक ही दिन पूर्णिमा और <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE" target="_blank" rel="noopener">भद्रा</a> लगने के कारण आपको मुहूर्त का खास ख्याल रखना होगा।</p>
<h2>राखी बांधने का शुभ महूर्त</h2>
<p>रक्षाबन्धन का शुभ मुहूर्त 30 अगस्त को रात 09 बजकर 01 मिनट के बाद से शुरू होगा और इस मुहूर्त का समापन 31 अगस्त को सूर्योदय काल में सुबह 07 बजकर 05 बजे पर होगा.</p>
<h2>क्यों नहीं बांधते भद्रा में राखी?</h2>
<p>हिन्दू शास्त्रों के अनुसार कहा जाता है कि शूर्पणखा ने अपने भाई रावण को भद्रा काल में ही राखी बांधी थी, जिस वजह से रावण के पूरे कुल का सर्वनाश हो गया था। इसलिए ऐसा माना जाता है कि बहनों को भद्राकाल में राखी नहीं बांधनी चाहिए।</p>
<h2>इन बातों का भी रखें ख्याल?</h2>
<ul>
<li>राखी बांधते समय अच्छे से नहा-धोकर साफ सुथरे कपड़े पहनें।</li>
<li>रक्षाबंधन वाले दिन भाई को राखी बांधते समय मुहूर्त का खास ख्याल रखें।</li>
<li>राखी से पहले जब भाई की पूजा करें, तो उस समय अक्षत यानि चावल के दाने टूटे हुए न हो।</li>
<li>आरती करते समय थाल में रखा हुआ दिया शुद्ध हो, वो टुटा हुआ नहीं होना चाहिए।</li>
<li>राखी बांधते समय भाई या बहन का चेहरा दक्षिण दिशा की तरफ नहीं होना चाहिए। इस दिशा में मुख करते हुए राखी बांधने पर उम्र कम होती है।</li>
<li>राखी बांधते समय भाई को टिका लगाते समय रोली या चंदन का इस्तेमाल करें। इस समय सिंदूर का इस्तेमाल न करें क्योंकि सिंदूर सुहाग की निशानी होता है।</li>
</ul>
<p>The post <a href="https://fundabook.com/raksha-bandhan-festival-date-time-2023/">रक्षाबन्धन : 30 या 31 अगस्त, कब बांधी जाएगी भाई को राखी, जाने इस पोस्ट के माध्यम से</a> appeared first on <a href="https://fundabook.com">Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</a>.</p>
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		<title>चैत्र नवरात्रि के दिनों में माँ दुर्गा को प्रसन्न करने के अचूक उपाय</title>
		<link>https://fundabook.com/perfect-remedies-to-please-durga-in-chaitra-navaratri/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[अरविन्द कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Mar 2023 11:32:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[astrology]]></category>
		<category><![CDATA[hindu culture]]></category>
		<category><![CDATA[Hindu religion]]></category>
		<category><![CDATA[hindu traditions]]></category>
		<category><![CDATA[india]]></category>
		<category><![CDATA[Indian traditions]]></category>
		<category><![CDATA[jyotish]]></category>
		<category><![CDATA[Religion]]></category>
		<category><![CDATA[traditions]]></category>
		<category><![CDATA[Traditions in India]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नवरात्रि भारतवर्ष में हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला प्रमुख पर्व है। इस दौरान मां दुर्गा के नौ अलग- अलग रूपों की पूजा की जाती है। वैसे तो साल में चार बार चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ के महीनों में नवरात्रि आती है, लेकिन उनमें से केवल चैत्र और आश्विन माह की नवरात्रि ही बड़े स्तर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://fundabook.com/perfect-remedies-to-please-durga-in-chaitra-navaratri/">चैत्र नवरात्रि के दिनों में माँ दुर्गा को प्रसन्न करने के अचूक उपाय</a> appeared first on <a href="https://fundabook.com">Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नवरात्रि</strong> भारतवर्ष में <strong>हिंदुओं</strong> द्वारा मनाया जाने वाला प्रमुख <strong>पर्व</strong> है। इस दौरान <strong>मां दुर्गा</strong> के नौ अलग- अलग रूपों की पूजा की जाती है।</p>
<p>वैसे तो साल में चार बार <strong>चैत्र, आषाढ़, आश्विन</strong> और <strong>माघ</strong> के महीनों में नवरात्रि आती है, लेकिन उनमें से केवल <strong>चैत्र</strong> और <strong>आश्विन माह</strong> की नवरात्रि ही बड़े स्तर पर मनाई जाती है।</p>
<p>आइए जानते हैं इस बार चैत्र नवरात्रि कब है और क्या है <strong>घट स्थापना</strong> का मुहूर्त। <strong>घट स्थापना</strong> का मतलब है <strong>कलश की स्थापना करना</strong>, इसे सही मुहूर्त में ही करना चाहिए और पूजा विधि का भी खास ख्याल रखना चाहिए।</p>
<p><img data-recalc-dims="1" loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-17856 aligncenter" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/04/chaitra-navratri.jpg?resize=696%2C465&#038;ssl=1" alt="" width="696" height="465" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/04/chaitra-navratri.jpg?w=400&amp;ssl=1 400w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/04/chaitra-navratri.jpg?resize=300%2C200&amp;ssl=1 300w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /></p>
<p>[adinserter block=&#8221;1&#8243;]</p>
<h2>चैत्र नवरात्रि घटस्थापना मुहूर्त</h2>
<p>चैत्र नवरात्रि की घटस्थापना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को होती है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 21 मार्च को रात 10 बजकर 52 मिनट से लेकर 22 मार्च को रात 08 बजकर 20 मिनट तक रहेगी। इसलिए घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 22 मार्च को सुबह 06 बजकर 23 मिनट से लेकर सुबह 07 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। यानी घटस्थापना के लिए आपको कुल 01 घंटा 09 मिनट की अवधि मिलेगी।</p>
<h2>ऐसे करें माँ दुर्गा को प्रसन्न</h2>
<p>चैत्र नवरात्रि के दौरान भक्त माँ दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए <strong>नौ दिनों</strong> का <strong>उपवास</strong> रखते हैं। इन नौ दिनों में तीन देवी <strong>पार्वती, लक्ष्मी</strong> और <strong>सरस्वती</strong> के <strong>नौ रुपों</strong> की <strong>पूजा</strong> होती है, जिन्हें <strong>नवदुर्गा</strong> कहते हैं।</p>
<p>भक्त ये 9 दिन देवी माँ की पूजा और <strong>नवरात्रि मंत्रों</strong> का जप करते हुए बिताते हैं। चैत्र नवरात्रि के पहले तीन दिनों को <strong>ऊर्जा माँ दुर्गा</strong> को समर्पित है।</p>
<p>अगले तीन दिन, <strong>धन की देवी, माँ लक्ष्मी</strong> को समर्पित है और आखिर के तीन दिन <strong>ज्ञान की देवी, माँ सरस्वती</strong> को समर्पित हैं।</p>
<p>यह माना जाता है कि जो भक्त बिना किसी इच्छा की पूर्ति के लिए नवदुर्गा की पूजा करते हैं, तो वह भक्त मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों के कुछ <strong>पूजा अनुष्ठान</strong> नीचे दिए गए हैं।</p>
<ul>
<li>घट स्थापना नवरात्रि के पहले दिन सबसे आवश्यक है, यह <strong>ब्रह्मांड</strong> का प्रतीक है। घर की <strong>शुद्धि</strong> और <strong>खुशाली</strong> के लिए इसे पवित्र स्थान पर रखें।</li>
<li>आप नवरात्रि पूजा शुरू करने से पहले <strong>देसी घी</strong> का <strong>दीपक</strong> जलाएं, जो कि घर और परिवार में <strong>शांति</strong> का प्रतीक है। यह घर की <strong>नकारात्मक ऊर्जा</strong> खत्म करता है और भक्तों में <strong>मानसिक संतोष</strong> बढ़ाता है।</li>
<li>नवरात्रि में घर में <strong>जौ</strong> की बीजाई करते है। ऐसी मान्यता है कि जौ इस सृष्टी की <strong>पहली फसल</strong> थी, इसीलिए इसे<strong> हवन</strong> में भी चढ़ाया जाता है। <strong>वसंत ऋतू</strong> में आने वाली पहली फसल भी जौ ही है, जिसे देवी माँ को चैत्र नवरात्रि के दौरान अर्पण करते है।</li>
<li>नवरात्रि के 9 दिनों में <strong>दुर्गा सप्तशती</strong> का पाठ करना शुभ माना जाता है, क्योंकि दुर्गा सप्तशती <strong>शांति, समृद्धि, धन</strong> और <strong>शांति</strong> का प्रतीक है।</li>
<li><strong>कन्या पूजन</strong> के दिन कन्या को <strong>फूल, इलायची, फल, सुपारी, मिठाई, श्रृंगार की वस्तुएं, कपड़े, घर का भोजन</strong> (खासकर: जैसे की हलवा, काले चने और पूरी) प्रस्तुत करें।</li>
</ul>
<p>[adinserter block=&#8221;1&#8243;]</p>
<h2>इन बातों का रखें ध्यान</h2>
<ul>
<li>त्योहार के शुरू होने से पहले, अपने घर में देवी का स्वागत करने के लिए घर की साफ सफाई करें।</li>
<li>उपवास करते वक्त सात्विक भोजन जैसे कि आलू, कुट्टू का आटा, दही, फल, आदि खाएं।</li>
<li>इन दिनों चमड़े का प्रयोग नहीं करना चाहिए।</li>
<li>नवरात्रि के दिनों में क्रोध से बचे रहें।</li>
<li>हर दिन सत्संग करें और कम से कम 2 घंटे का मौन रखें।</li>
</ul>
<p><strong>यह भी पढ़ें-</strong></p>
<ul>
<li><a href="https://fundabook.com/9-days-navratri-know-which-day-indulge-in-hindi/"><strong>नवरात्रि के 9 दिनों में, जानिए किस दिन कौन सा भोग लगाएं!!</strong></a></li>
<li><strong><a href="https://fundabook.com/know-which-tasks-will-be-fulfilled-by-doing-actions-chaitra-navratri/">जानिए नवरात्रि में कौन से कार्य करने से होगी मनोकामना पूर्ण !!</a></strong></li>
<li><strong><a href="https://fundabook.com/eating-garlic-onion-prohibited-during-navratri-hindi/">जानिए क्यों नवरात्रि के दौरान लहसुन-प्याज खाना वर्जित होता है?</a></strong></li>
<li><strong><a href="https://fundabook.com/some-interesting-facts-related-to-the-nine-days-of-navratri/">नवरात्रि के नौं दिनों से जुड़े कुछ रोचक तथ्य</a> </strong></li>
<li><strong><a href="https://fundabook.com/perfect-remedies-to-please-durga-in-chaitra-navaratri/">चैत्र नवरात्रि के दिनों में माँ दुर्गा को प्रसन्न करने के अचूक उपाय</a></strong></li>
</ul>
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		<title>जानिए अपनी राशि के अनुसार किस रंग से खेलें होली</title>
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		<dc:creator><![CDATA[अरविन्द कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Mar 2022 09:07:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>वैसे तो हर त्यौहार का अपना एक रंग और महत्व होता है, लेकिन हरे, पीले, लाल, गुलाबी आदि असल रंगों का त्यौहार होली बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। होली के आते ही वातावरण में एक मस्ती का आलम छा जाता है। होली के दिन रंगों के माध्यम से सारी भिन्नताएं मिट जाती हैं और सब बस [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>वैसे तो हर त्यौहार का अपना एक रंग और महत्व होता है, लेकिन हरे, पीले, लाल, गुलाबी आदि असल रंगों का त्यौहार होली बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। होली के आते ही वातावरण में एक मस्ती का आलम छा जाता है।</p>
<p>होली के दिन रंगों के माध्यम से सारी भिन्नताएं मिट जाती हैं और सब बस एक रंग के हो जाते हैं। हर किसी का तन-मन, प्रेम-उल्लास और उमंग के रंगों की फुहार से भर जाता है।</p>
<p>आइए जानते हैं अपनी राशि के अनुसार किस रंग से खेलें होली।</p>
<p><img data-recalc-dims="1" loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-17526 aligncenter" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/Holi.jpg?resize=657%2C376&#038;ssl=1" alt="" width="657" height="376" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/Holi.jpg?w=400&amp;ssl=1 400w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2019/03/Holi.jpg?resize=300%2C172&amp;ssl=1 300w" sizes="auto, (max-width: 657px) 100vw, 657px" /></p>
<h2>कब है होली</h2>
<p>होली 2019 तिथि की बात करें तो, इस बार होली 21 मार्च 2019 को है और 20 मार्च 2019 को होलिका दहन है। होलिका दहन और होली के शुभ मुहूर्त का समय 20 मार्च की सुबह 10:44 से शुरू होकर 21 मार्च की शाम 07:12 तक है।</p>
<h2>क्यों मनाई जाती है होली</h2>
<p>हिन्दू मान्यताओं के अनुसार हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहते थे। उनकी इस भक्ति से उनके पिता हिरण्यकश्यप नाखुश थे, इसीलिए उनके पिता ने अपने पुत्र को भगवान की भक्ति से हटाने के लिए कई प्रयास किए।</p>
<p>हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जल सकेगी। एक बार हिरण्यकश्यप ने अपनी ही बहन होलिका के जरिए प्रह्लाद को जिंदा जला देने का आदेश दिया, लेकिन भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की।</p>
<p>जब होलिका प्रह्लाद को जलाने के लिए आग में बैठी, तो वह खुद जल कर मर गई। तभी से इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में जाना जाता है और हिन्दू धर्म में होलिका दहन की परंपरा प्रचलित है। होलिका दहन से अगले दिन दुलहंडी (होली) खेला जाता है।</p>
<h2>अपनी राशि के अनुसार किस रंग से खेलें होली</h2>
<h2>मेष &#8211; वृश्चिक राशि</h2>
<p>इन राशियों का स्वामी मंगल है, जो ऊर्जा का कारक है और वहीं गुस्से का भी। इन दोनों राशि के लोगों के लिए गुलाबी और पीला रंग उत्तम रहेगा।</p>
<h2>वृषभ &#8211; तुला राशि</h2>
<p>इन राशियों का स्वामी शुक्र है और शुभ रंग सिल्वर है, लेकिन इस कलर का उपयोग करना ठीक नहीं रहेगा। इन दोनों राशि के लोग आसमानी और हल्के नीले रंगों का प्रयोग करें और अपने आसपास के माहौल को खुशनुमा बनाएं।</p>
<h2>मिथुन &#8211; कन्या राशि</h2>
<p>इन राशियों का स्वामी बुध है। इन राशि के लोग हल्के हरे रंग, गुलाबी, पीले, नारंगी, आसमानी रंगों का प्रयोग कर इस त्योहार को यादगार बनाएं।</p>
<h2>कर्क राशि</h2>
<p>इस राशि का स्वामी चन्द्रमा है। इसका रंग सफेद है, इसीलिए आप कोई भी रंग दही में मिलाकर प्रयोग करें। इस प्रकार रंगों भरी होली भी हो जाएगी और दही के प्रयोग से चेहरे पर हानिकारक प्रभाव भी कम होगा। इस राशि के लोग भावुक होते हैं, तो उनके साथ होली की मस्ती सादगी से ही होनी चाहिए।</p>
<h2>सिंह राशि</h2>
<p>इस राशि का स्वामी सूर्य है, इसीलिए इस राशि के रंग भी बड़े सुहावने हैं, जैसे गुलाबी हल्के हरे, नारंगी, पीले आदि। इन रंगों से आपका प्रभाव भी बढ़ेगा। इस राशि वाले लोग उत्साही होते हैं, तो इनके साथ खूब मस्ती वाली होली खेली जा सकती है।</p>
<h2>मकर &#8211; कुंभ राशि</h2>
<p>इन राशियों का स्वामी शनि है और इनका रंग आसमानी, नीला और फिरोजी होता है। ये राशि के लोग हरे रंग का भी प्रयोग कर सकते हैं। इन राशि वालों के साथ होली खेलना बड़ा ही दिलचस्प होता है।</p>
<h2>धनु &#8211; मीन राशि</h2>
<p>इन राशियों का स्वामी गुरु है, जो संत प्रवृत्ति का कारक है। इनका रंग पीला, नारंगी और गुलाबी हैं। ये राशि वाले लोग सादगीपसंद होते हैं। इनके साथ सलीके से होली खेलकर इनका दिल जीत सकते हैं।</p>
<h2>होली पूजन विधि</h2>
<p>लकड़ी और कंडों की होली के साथ घास लगाकर होलिका खड़ी करके उसका पूजन करने से पहले हाथ में असद, फूल, सुपारी, पैसा लेकर पूजन कर जल के साथ होलिका के पास छोड़ दें और अक्षत, चंदन, रोली, हल्दी, गुलाल, फूल तथा गूलरी की माला पहनाएं।</p>
<p>इसके बाद होलिका की तीन परिक्रमा करते हुए नारियल का गोला, गेहूं की बाली तथा चना को भूंज कर इसका प्रसाद सभी को वितरित करें। होली की पूजा करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि, संतान प्राप्ति होती है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें &#8211;</strong></p>
<ul>
<li><strong><a href="https://fundabook.com/why-and-how-these-religion-and-countries-observe-diwali-festival/">आईये देखें कि अलग-2 धर्म और देश क्यों और कैसे मनाते हैं दीवाली</a></strong></li>
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</ul>
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