<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>dayanand sarswati Archives - Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</title>
	<atom:link href="https://fundabook.com/search/dayanand-sarswati/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://fundabook.com/search/dayanand-sarswati/</link>
	<description>रोचक तथ्य और जानकारी हिन्दी में!</description>
	<lastBuildDate>Sat, 05 Mar 2022 04:05:51 +0000</lastBuildDate>
	<language>hi</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.3</generator>
<site xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">100044268</site>	<item>
		<title>महर्षि दयानंद सरस्वती &#8211; दया की मूर्ती जिन्होंने अपने हत्यारे की भागने में मदद की &#8211; रोचक तथ्य</title>
		<link>https://fundabook.com/maharishi-swami-dayanand-sarswati-facts-hindi/</link>
					<comments>https://fundabook.com/maharishi-swami-dayanand-sarswati-facts-hindi/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[अरविन्द कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Feb 2022 11:36:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Interesting Facts]]></category>
		<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म-संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[arya]]></category>
		<category><![CDATA[arya samaj]]></category>
		<category><![CDATA[dayanand sarswati]]></category>
		<category><![CDATA[dharam]]></category>
		<category><![CDATA[god]]></category>
		<category><![CDATA[moolshankar]]></category>
		<category><![CDATA[Religion]]></category>
		<category><![CDATA[swami]]></category>
		<category><![CDATA[vedic]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://fundabook.com/?p=33689</guid>

					<description><![CDATA[<p>महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक, तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उनके बचपन का नाम &#8216;मूलशंकर&#8217; था। उन्होंने वेदों के प्रचार और आर्यावर्त अर्थात भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए आर्यसमाज की स्थापना की। स्वराज शब्द का प्रयोग पहली बार स्वामी दयानंद सरस्वती ने ही किया था। प्रारम्भिक जीवन [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://fundabook.com/maharishi-swami-dayanand-sarswati-facts-hindi/">महर्षि दयानंद सरस्वती &#8211; दया की मूर्ती जिन्होंने अपने हत्यारे की भागने में मदद की &#8211; रोचक तथ्य</a> appeared first on <a href="https://fundabook.com">Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक, तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उनके बचपन का नाम &#8216;मूलशंकर&#8217; था। उन्होंने वेदों के प्रचार और आर्यावर्त अर्थात भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए आर्यसमाज की स्थापना की। <strong>स्वराज</strong> शब्द का प्रयोग पहली बार स्वामी दयानंद सरस्वती ने ही किया था।</p>
<h2 id="प्रारम्भिक_जीवन" data-mw-section-id="1">प्रारम्भिक जीवन</h2>
<p id="mwMA"><img data-recalc-dims="1" fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-33692" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/maharishi-swami-dayanand-sarswati.jpeg?resize=394%2C447&#038;ssl=1" alt="" width="394" height="447" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/maharishi-swami-dayanand-sarswati.jpeg?w=394&amp;ssl=1 394w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/maharishi-swami-dayanand-sarswati.jpeg?resize=264%2C300&amp;ssl=1 264w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/maharishi-swami-dayanand-sarswati.jpeg?resize=370%2C420&amp;ssl=1 370w" sizes="(max-width: 394px) 100vw, 394px" />स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म 26 फ़रवरी 1824 में टंकारा,  जिला राजकोट, गुजरात में हुआ था। (कुछ स्रोत 12 फरवरी को मानते हैं।)</p>
<p>उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के एक अमीर, समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे।</p>
<p>दयानन्द सरस्वती का प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता। परन्तु उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गंभीर प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया।</p>
<p>एक बार <a href="https://fundabook.com/perfect-remedies-to-please-mahadev-on-mahashivaratri/">महाशिवरात्रि</a> की घटना है जब वे चौदह वर्ष के थे। शिवरात्रि की रात उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मन्दिर में रुका हुआ था। सारे परिवार के सो जाने के पश्चात् भी वे जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। इस घटना का उनके मस्तिष्क पर बहुत गहरा <span id="42_TRN_2r">प्रभाव पड़ा</span>।</p>
<p>यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये <a id="mwRg" title="प्रसाद" href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6" rel="mw:WikiLink" data-ve-attributes="{&quot;rel&quot;:&quot;mw:WikiLink&quot;}">प्रसाद</a> की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा कैसे करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।</p>
<p id="mwRw">अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे जिससे उनके माता पिता चिन्तित रहने लगे। तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह किशोरावस्था के प्रारम्भ में ही करने का निर्णय किया (19वीं सदी के <span id="42_TRN_4h">भारत</span> में यह आम प्रथा थी)।</p>
<p>लेकिन बालक मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं बना है और वे 1846 में सत्य की खोज में निकल पड़े।</p>
<h2>वेद, ईश्वर और धर्म पर दयानंद सरस्वती के विचार</h2>
<p>स्वामी दयानन्द ने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। &#8216;वेदों की ओर लौटो&#8217; यह उनका प्रमुख नारा था। उन्होंने वेदों का भाष्य किया इसलिए उन्हें &#8216;महर्षि&#8217; भी कहा जाता है क्योंकि &#8216;ऋषयो मन्त्र दृष्टारः&#8217; (वेदमन्त्रों के अर्थ का दृष्टा ऋषि होता है)।</p>
<p>स्वामी जी एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे. उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया. उनका कहना था कि किसी भी अहिन्दू को हिन्दू धर्म में लिया जा सकता है. इससे हिंदुओं का धर्म परिवर्तन रूक गया।</p>
<p>उनका अगला कदम ईश्वर के प्रति पूर्ण-समर्पण के साथ हिंदू धर्म में सुधार करना था। उन्होंने अपने तर्कों, संस्कृत और वेदों के ज्ञान के बल पर देश भर के धार्मिक विद्वानों और पुजारियों को वेद, धर्म और ईश्वर पर चर्चा के लिए चुनौती देते हुए देश की यात्रा की और हर बार, बार बार जीत कर निकले।</p>
<p>22 अक्टूबर 1869 को वाराणसी में, उन्होंने 27 विद्वानों और 12 विशेषज्ञ पंडितों के खिलाफ एक बहस (debate) जीती। कहा जाता है कि इस <span id="42_TRN_6z">बहस</span> में 50,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया था। इस बहस का मुख्य विषय था &#8220;क्या वेद मूर्ति-पूजा को प्रोत्साहित करते हैं?</p>
<p>उस समय पुजारियों ने सामान्य लोगों को वैदिक शास्त्रों को पढ़ने से हतोत्साहित किया। उन्होंने तथाकथित धार्मिक अनुष्ठानों, जैसे कि गंगा नदी में स्नान करना और वर्षगाँठ पर पुजारियों को खाना खिलाना आदि को बढ़ावा दिया। पुजारियों ने लोगों को स्वयं को धन, गौ-धन, वस्त्र, <span id="42_TRN_7i">सोना</span> आदि दान <span id="42_TRN_5s">देने </span>को प्रोत्साहित किया, जिसे दयानंद सरस्वती ने अंधविश्वास या आत्म-सेवा प्रथाओं के रूप मान कर <span id="42_TRN_7d">नकार दिया</span>।</p>
<p><span id="42_TRN_64">इस</span> तरह की अंधविश्वासी धारणाओं को अस्वीकार करने के लिए राष्ट्र को प्रोत्साहित करके, उनका उद्देश्य राष्ट्र को वेदों की शिक्षाओं पर लौटने और वैदिक जीवन शैली का पालन करने के लिए शिक्षित करना था। उन्होंने हिंदुओं को राष्ट्रीय समृद्धि के लिए गायों के महत्व के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता के लिए राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी को अपनाने सहित सामाजिक सुधारों को स्वीकार करने का भी आह्वान किया।</p>
<h2>धर्म और राष्ट्र के प्रति <span id="42_TRN_76">योगदान</span></h2>
<p><img data-recalc-dims="1" decoding="async" class="size-full wp-image-33691 alignright" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/Dayananda_Saraswati.jpeg?resize=315%2C545&#038;ssl=1" alt="" width="315" height="545" srcset="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/Dayananda_Saraswati.jpeg?w=315&amp;ssl=1 315w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/Dayananda_Saraswati.jpeg?resize=173%2C300&amp;ssl=1 173w, https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/Dayananda_Saraswati.jpeg?resize=243%2C420&amp;ssl=1 243w" sizes="(max-width: 315px) 100vw, 315px" />अपने दैनिक जीवन और योग और आसनों, शिक्षाओं, उपदेशों, उपदेशों और लेखन के अभ्यास के माध्यम से, उन्होंने हिंदुओं को <strong>स्वराज्य</strong> (स्वशासन), राष्ट्रवाद और अध्यात्मवाद की आकांक्षा के लिए प्रेरित किया। उन्होंने महिलाओं के समान अधिकारों और सम्मान की वकालत की और लिंग की परवाह किए बिना सभी बच्चों की शिक्षा की वकालत की।</p>
<p>स्वामी दयानंद सरस्वती का मानना ​​​​था कि वेदों के मूलभूत सिद्धांतों के प्रति अज्ञानता और भटकाव के कारण हिंदू धर्म भ्रष्ट हो गया था और पुजारियों के द्वारा अपने निजी हित के कारण आम-जन को द्वारा गुमराह किया जा रहा था। इस शोषण और पथ-भ्रष्टता को रोकने के लिए, उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की, जिसमें दस सार्वभौमिक सिद्धांतों को सार्वभौमिकता के लिए एक कोड के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसे &#8220;कृण्वन्तो विश्वं आर्यं&#8221; कहा गया।</p>
<p>मूर्तिपूजा और कर्मकांडों की पूजा का खंडन करते हुए उन्होंने वैदिक विचारधाराओं को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम किया। इसके बाद, भारत के दार्शनिक और राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने उन्हें &#8220;<strong>आधुनिक भारत के निर्माताओं</strong>&#8221; में से एक कहा, ठीक ऐसा ही श्री <strong>अरबिंदो</strong> ने भी कहा था।</p>
<p>उन्होंने कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा सन्यास को अपने दर्शन के चार स्तम्भ बनाया। उन्होंने ही सबसे पहले 1876 में &#8216;स्वराज्य&#8217; का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। प्रथम जनगणना के समय स्वामी जी ने आगरा से देश के सभी आर्य-सामाजियों को यह निर्देश भिजवाया कि सब सदस्य अपना धर्म &#8220;सनातन धर्म&#8221; लिखवाएं। उनका मत था कि &#8216;हिंदू&#8217; शब्द विदेशियों की देन है और &#8216;फारसी भाषा&#8217; में इसके अर्थ &#8216;चोर, डाकू&#8217; इत्यादि लिखे गए हैं।</p>
<h2>दयानंद सरस्वती &#8211; महान प्रेरणास्रोत</h2>
<p>स्वामी दयानंद सरस्वती के तार्किक, ज्वलंत <span id="42_TRN_13">और</span> <span id="42_TRN_12">क्रांतिकारी</span> विचारों ने भारत के असंख्य मनुष्यों को प्रभावित और प्रेरित किया।  इनमें कई महापुरुषों के नाम भी शामिल है, जिनमें प्रमुख नाम हैं- मादाम भिकाजी कामा, शहीद भगत सिंह, पण्डित लेखराम आर्य, स्वामी श्रद्धानन्द, चौधरी छोटूराम पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी, श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, मदनलाल ढींगरा, राम प्रसाद &#8216;बिस्मिल&#8217;, महादेव गोविंद रानाडे, महात्मा हंसराज, लाला लाजपत राय इत्यादि।</p>
<p>स्वामी दयानन्द के प्रमुख अनुयायियों में लाला हंसराज ने सन 1886 में लाहौर में &#8216;दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज&#8217; की स्थापना की तथा स्वामी श्रद्धानन्द जी ने 1901 में हरिद्वार के निकट <strong>कांगड़ी</strong> में गुरुकुल की स्थापना की।</p>
<blockquote><p>स्वामी दयानंद आधुनिक भारत के निर्माताओं में सर्वोच्च स्थान पर हैं। उन्होंने देश की राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मुक्ति के लिए अथक प्रयास किया। हिंदू धर्म को वैदिक नींव पर वापस ले जाने के मिशन को उन्होंने तर्क द्वारा निर्देशित किया। उन्होंने समाज को सुधारने का प्रयास किया, जिसकी सख्त जरूरत थी और फिर से पड़ेगी। भारतीय संविधान में किए गए कुछ सुधार उनकी शिक्षाओं से प्रेरित थे<br />
&#8211; <em>डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन</em></p></blockquote>
<p>महर्षि दयानन्द के हृदय में आदर्शवाद की उच्च भावना, तार्किक और यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि की नियति को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से युगानुकूल चिन्तन करने की तीव्र इच्छा तथा आर्यावर्तीय (भारतीय) जनता में गौरवमय अतीत के प्रति निष्ठा जगाने की भावना थी। उन्होंने किसी के विरोध तथा निन्दा करने की परवाह किये बिना आर्यावर्त (भारत) के हिन्दू समाज का कायाकल्प करना अपना ध्येय बना लिया था।</p>
<h2>दयानंद सरस्वती का साहित्य में योगदान</h2>
<p>दयानंद सरस्वती ने 60 से अधिक रचनाएँ लिखीं, जिनमें छह वेदांगों की 16 खंडों की व्याख्या, अष्टाध्यायी (पाणिनी का व्याकरण) पर एक अधूरी टिप्पणी, नैतिकता और नैतिकता पर कई छोटे पथ, वैदिक अनुष्ठान और संस्कार, और विश्लेषण पर एक अंश शामिल हैं। उनके कुछ प्रमुख कार्यों में <a href="https://fundabook.com/satyarth-prakash-maharishi-dayanand-saraswati/">सत्यार्थ प्रकाश</a>, सत्यार्थ भूमिका, संस्कारविधि, ऋग्वेददी भाष्य भूमिका, ऋग्वेद भाष्य (7/61/2 तक) और यजुर्वेद भाष्यम शामिल हैं। भारतीय शहर अजमेर में स्थित <strong>परोपकारिणी सभा</strong> की स्थापना सरस्वती ने अपने कार्यों और वैदिक ग्रंथों को प्रकाशित करने और प्रचार करने के लिए की थी।</p>
<h2>नारी सशक्तिकरण में योगदान</h2>
<p>दयानंद के कई सारे बहुमूल्य योगदानों में एक महिलाओं के लिए समान अधिकारों को बढ़ावा देना, जैसे कि शिक्षा का अधिकार और भारतीय शास्त्रों को पढ़ने का अधिकार शामिल था। उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को भी प्रोत्साहित किया।</p>
<h2>स्वामी दयानंद सरस्वती की मृत्यु</h2>
<p>सन 1883 में, जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय ने स्वामी जी को अपने महल में आमंत्रित किया। महाराजा दयानंद के शिष्य बनने और उनकी शिक्षाओं को सीखने के लिए उत्सुक थे। दयानंद अपने प्रवास के दौरान महाराजा के विश्राम कक्ष में गए और उन्हें <strong>नन्ही-जान</strong> नाम की एक नृत्यांगना लड़की के साथ देखा। दयानंद ने महाराजा से कहा कि वह लड़की और सभी अनैतिक कार्यों को त्याग दें और एक सच्चे आर्य (महान) की तरह धर्म का पालन करें। दयानंद के सुझाव ने नन्ही को नाराज कर दिया, और उसने बदला लेने का फैसला किया।</p>
<p>29 सितंबर 1883 को, उसने दयानंद के रसोइए <strong>जगन्नाथ</strong> को रात के दूध में कांच के छोटे टुकड़े मिलाने के लिए रिश्वत दी।  दयानंद को सोने से पहले गिलास से भरा दूध परोसा गया, जिसे उन्होंने तुरंत पी लिया। वह कई दिनों तक बिस्तर पर पड़े रहे और असहनीय दर्द सहते रहे। महाराजा ने तुरंत उसके लिए डॉक्टर की सेवाओं की व्यवस्था की। हालांकि, जब तक डॉक्टर पहुंचे, तब तक उनकी हालत खराब हो चुकी थी, और उन्हें बड़े रक्तस्रावी घाव हो गए थे।</p>
<p>दयानंद की पीड़ा को देखकर, जगन्नाथ अपराध बोध से भर गया और उन्होंने दयानंद के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। अपनी मृत्युशय्या पर पड़े दयानन्द ने उसे क्षमा कर दिया और उसे 500 रुपये दिए और कहा कि महाराजा के आदमियों द्वारा उसे खोजे जाने और मार डालने से पहले वह नेपाल भाग जाए। ऐसे दया की मूर्ति थें हमारे स्वामी दयानद!</p>
<p>वेदों पर संस्कृत के साथ-साथ हिंदी में उनका साहित्य, सनातन धर्म की रक्षा का उनका संकल्प, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों पर उनके प्रहार, महिला कल्याण, स्वराज की प्रेरणा और भारत के जनमानस की भलाई के लिए उनका योगदान अमूल्य है। देश उनके दिखाए दया, धर्म, शांति और समृद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित होता रहेगा, ऐसी आशा और कामना है।</p>
<h4><strong>आगे पढ़ें:</strong></h4>
<h4 class="entry-title"><strong><a href="https://fundabook.com/satyarth-prakash-maharishi-dayanand-saraswati/">सत्यार्थप्रकाश – अंधविश्वास, पाखण्ड और सामाजिक कुरीतिओं पर चोट करते तथ्य जो आपने कहीं नहीं पढ़े होंगे</a></strong></h4>
<p>The post <a href="https://fundabook.com/maharishi-swami-dayanand-sarswati-facts-hindi/">महर्षि दयानंद सरस्वती &#8211; दया की मूर्ती जिन्होंने अपने हत्यारे की भागने में मदद की &#8211; रोचक तथ्य</a> appeared first on <a href="https://fundabook.com">Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://fundabook.com/maharishi-swami-dayanand-sarswati-facts-hindi/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">33689</post-id>	</item>
		<item>
		<title>सत्यार्थप्रकाश &#8211; अंधविश्वास, पाखण्ड और सामाजिक कुरीतिओं पर चोट करते तथ्य जो आपने कहीं नहीं पढ़े होंगे</title>
		<link>https://fundabook.com/satyarth-prakash-maharishi-dayanand-saraswati/</link>
					<comments>https://fundabook.com/satyarth-prakash-maharishi-dayanand-saraswati/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[अरविन्द कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Feb 2022 07:54:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Interesting Facts]]></category>
		<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म-संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[dayanand sarswati]]></category>
		<category><![CDATA[geeta]]></category>
		<category><![CDATA[Hindu religion]]></category>
		<category><![CDATA[kuran]]></category>
		<category><![CDATA[puranas]]></category>
		<category><![CDATA[satyarth prakash]]></category>
		<category><![CDATA[satyarthprakash]]></category>
		<category><![CDATA[upnishad]]></category>
		<category><![CDATA[vedas]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://fundabook.com/?p=33660</guid>

					<description><![CDATA[<p>सत्यार्थप्रकाश (Satyarth Prakash, सत्यार्थ प्रकाश) ग्रन्थ की रचना महान चिन्तक, समाज सुधारक एवं विद्वान महर्षि दयानन्द सरस्वती ने 1875 ई में की थी। अब तक इसके 20 से अधिक संस्करण अलग-अलग भाषाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उस दौर में हिन्दू शास्त्रों की गलत व्याख्या करके हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को अपने निजी स्वार्थ के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://fundabook.com/satyarth-prakash-maharishi-dayanand-saraswati/">सत्यार्थप्रकाश &#8211; अंधविश्वास, पाखण्ड और सामाजिक कुरीतिओं पर चोट करते तथ्य जो आपने कहीं नहीं पढ़े होंगे</a> appeared first on <a href="https://fundabook.com">Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><b>सत्यार्थप्रकाश</b> (Satyarth Prakash, सत्यार्थ प्रकाश) ग्रन्थ की रचना महान चिन्तक, समाज सुधारक एवं विद्वान <a title="दयानन्द सरस्वती" href="https://fundabook.com/maharishi-swami-dayanand-sarswati-facts-hindi/">महर्षि दयानन्द सरस्वती</a> ने 1875 ई में की थी। अब तक इसके 20 से अधिक संस्करण अलग-अलग भाषाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।</p>
<p><a href="https://fundabook.com/recommends/satyarth-prakash-book-az-search-results/"><img data-recalc-dims="1" decoding="async" class=" wp-image-33667 alignright" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/Satyarth-Prakash-Maharishi-DayanandSarswati.jpeg?resize=232%2C334&#038;ssl=1" alt="" width="232" height="334" /></a>उस दौर में हिन्दू शास्त्रों की गलत व्याख्या करके हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने चलन बढ़ रहा था। साथ ही शास्त्रों का गलत अर्थ निकाल कर हिन्दू धर्म को बदनाम करने का षड्यन्त्र चल रहा था।</p>
<p>इसी बात को ध्यान में रखकर महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इसका नाम <i>सत्यार्थप्रकाश</i> (सत्य + अर्थ + प्रकाश) अर्थात् <i>सही अर्थ पर प्रकाश डालने वाला</i> (ग्रन्थ) रखा। स्वयं स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनुसार इस रचना का मुख्य प्रयोजन <b>सत्य को सत्य और मिथ्या को मिथ्या ही प्रतिपादन करना</b> है।</p>
<p><a href="https://fundabook.com/recommends/satyarth-prakash-book-az-search-results/">सत्यार्थ प्रकाश</a> में चौदह समुल्लास (अध्याय) हैं। इन अध्यायों में ईश्वर, सृष्टि-उत्पत्ति, बाल-शिक्षा, अध्ययन-अध्यापन, विवाह एवं गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास-राजधर्म, बंध-मोक्ष, आचार-अनाचार, आर्यावर्तदेशीय मतमतान्तर, ईसाई मत तथा इस्लाम पर विस्तृत विवेचन और व्याख्या की गयी है।</p>
<table class="wikitable">
<tbody>
<tr>
<th>अध्याय</th>
<th>विषय</th>
</tr>
<tr>
<td>प्रथम</td>
<td>ईश्वर के ओंकारादि नामों की व्याख्या</td>
</tr>
<tr>
<td>द्वितीय</td>
<td>सन्तानों की शिक्षा</td>
</tr>
<tr>
<td>तृतीय</td>
<td>ब्रह्मचर्य, पठनपाठन व्यवस्था, सत्यासत्य ग्रन्थों के नाम और पढ़ने-पढ़ाने की रीति</td>
</tr>
<tr>
<td>चतुर्थ</td>
<td>विवाह और गृहस्थाश्रम का व्यवहार</td>
</tr>
<tr>
<td>पञ्चम</td>
<td>वानप्रस्थ और संन्यासाश्रम की विधि</td>
</tr>
<tr>
<td>षष्ट</td>
<td>राजधर्म</td>
</tr>
<tr>
<td>सप्तम</td>
<td>वेद एवं ईश्वर</td>
</tr>
<tr>
<td>अष्टम</td>
<td>जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय</td>
</tr>
<tr>
<td>नवम</td>
<td>विद्या, अविद्या, बन्ध और मोक्ष की व्याख्या</td>
</tr>
<tr>
<td>दशम</td>
<td>आचार, अनाचार और भक्ष्याभक्ष्य विषय</td>
</tr>
<tr>
<td>एकादशम</td>
<td>आर्य्यावर्त्तीय मतमतान्तर का खण्डन मण्डन</td>
</tr>
<tr>
<td>द्वादशम</td>
<td>चार्वाक, बौद्ध और जैन मत</td>
</tr>
<tr>
<td>त्रयोदशम</td>
<td>ईसायत (बाइबल)</td>
</tr>
<tr>
<td>चतुर्दशम</td>
<td>मुसलमानों का मत (कुरान)</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>&nbsp;</p>
<p>इसकी भाषा के सम्बन्ध में दयानन्द जी ने सन् 1882 में इस ग्रन्थ के दूसरे संस्करण में स्वयं यह लिखा &#8211;<i>&#8220;जिस समय मैंने यह ग्रन्थ बनाया था, उस समय.संस्कृत भाषण करने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती होने के कारण मुझको इस भाषा (हिन्दी) का विशेष परिज्ञान न था। इससे भाषा अशुद्ध बन गई थी। अब इसको भाषा-व्याकरण-अनुसार शुद्ध करके दूसरी बार छपवाया है।&#8221;</i></p>
<h2><span id="मुख्य_सन्देश" class="mw-headline">सत्यार्थप्रकाश के मुख्य सन्देश</span></h2>
<p>इसके मुख्य संदेश पारम्परि्क हिन्दू रीति से अलग और कहीं-कही  विरूद्ध भी हैं। ये इस प्रकार हैं &#8211;</p>
<ul>
<li><strong>ओ३म्</strong> परमात्मा का निज नाम है। सत्य होने की वजह से ब्रह्म, सर्वत्र व्यापक होने की वजह से <i>विष्णु</i>, कल्याणकारी होने से <i>शिव</i>, सारी प्रजा के उत्पादक होने की वजह से <i>गणपति</i> और <i>प्रजापति</i>, दुष्टदमन होने से <i>रूद्र</i> तथा सोम, अग्नि इत्यादि उसी एक परमात्मा के नाम हैं।</li>
</ul>
<ul>
<li>परमात्मा को कोई रंग या स्वरूप नहीं है। ईश्वर कोई अवतार, पैगम्बर या मसीहा नहीं भेजता। अपने कर्मों के कारण ही कोई मनुष्य आदरणीय बनता है। <strong>राम</strong> और श्रीकृष्ण आदरणीय महापुरुष थे, लेकिन <span id="35_TRN_5">ईश्वरावतार</span> नहीं। परमात्मा सर्वआनन्दमय &#8211; सच्चिदानन्द हैं। दरअसल ईश्वर अनंत व् अपरिमित(unlimited) है अत वह अंत अथवा परिमित (limited) शरीर में नहीं समा सकता।</li>
</ul>
<ul>
<li>देव का अर्थ होता है <i>देने वाला (दान या कृपा)</i> &#8211; अतः ऋषि, मुनि या <a href="https://fundabook.com/6-places-of-india-are-recorded-world-record-hindi/">कोई नदी</a> जो कईयों का कल्याण करे, सूर्य, नक्षत्र आदि देव<sup id="cite_ref-5" class="reference"></sup> हैं। लेकिन उपासना ईश्वर की ही करनी चाहिए जो इन सभी का कर्ता है। इसी से एकमात्र ईश्वर का ही नाम <strong><i>महादेव</i></strong> है। वेद मंत्रों को भी देव कहा गया है क्योंकि उनके आत्मसात करने से कल्याण होता है।</li>
</ul>
<ul>
<li>वर्ण व्यवस्था गुण और कर्म को लेकर होती है &#8211; जन्म से नहीं। राजा का बेटा आवश्यक नहीं कि क्षत्रिय ही हो। ये उसके बल, पराक्रम, इन्दि्रजित और कल्याणकारी गुण पर निर्भर है। इत्यादि..</li>
</ul>
<ul>
<li>मूर्तिपूजा वेदों (और उपनिषदों) में कहीं नहीं है। मूर्ति पूजन से लोग मूर्तिआश्रित हो जाते हैं और पुरुषार्थ के लिए प्रेरित नहीं रहते। सिर्फ पुरुषार्थ से ही जीवों का कल्याण हो सकता है।</li>
</ul>
<ul>
<li>जीव (आत्मा, पुरुष), प्रकृति और परमात्मा तीनों एक दूसरे से पृथक हैं। परमात्मा जीवों पर नियंत्रण नहीं करता &#8211; लोग अपने कार्य के लिए स्वतंत्र हैं। परिणाम अपने कार्य के अनुसार ही होगा &#8211; परमात्मा की इच्छा के अनुसार नहीं।</li>
</ul>
<ul>
<li>मोक्ष प्राप्ति के लिए अष्टांग योग, उत्तम कर्म, पवित्रता, यज्ञ (पदार्ध यज्ञ, दान, त्याग और निष्काम कर्म) सत्य का साथ और मिथ्या को दूर छोड़ना, विद्वान पुरुषों का संग, विवेक (सत्य और असत्य का विवेचन) इत्यादि करना चाहिए।</li>
</ul>
<ul>
<li>ईश्वर उपासना करने से अपराध क्षमा नहीं करता &#8211; कई हिन्दू (और इस्लामी तथा अन्य) मतों में ईश्वर पूजन के लिए ऐसा  प्रस्तुत किया जाता है कि ईश्वर हमारे पाप क्षमा कर देता है परन्तु पुस्तक के अनुसार ईश्वर सिर्फ सत्यज्ञान दे सकता है। अपराध क्षमा करना (जैसे हरि या बिसमिल्लाह बोलकर) ईश्वर जैसे न्यायकारी शक्ति के अनुकूल नहीं है।</li>
</ul>
<ul>
<li>वैष्णव, शैव, शाक्त, कापालिक, चक्रांकित और चार्वाक मत वेदों को नहीं समझ सकने के कारण बने हैं। ईश्वर का कोई रूप या अवतार नहीं होता क्योंकि वेदों में इनका कहीं विवरण नहीं मिलता।</li>
</ul>
<ul>
<li>श्राद्ध, तर्पण आदि कर्म जीवित श्रद्धापात्रों (माता पिता, पितर, गुरु आदि) के लिए होता है, मृतकों के लिए नहीं।</li>
</ul>
<ul>
<li>तीर्थ दुख ताड़ने का नाम है &#8211; किसी सागर या नदी-सरोवर में नहाने का नहीं। इसी प्रकार आत्मा के (मोक्ष पश्चात) सुगम विचरण को स्वर्ग और <a href="https://fundabook.com/10-true-stories-of-rebirth/">पुनर्जन्म</a> के बंधन में पड़ने को नरक कहते है &#8211; ऐसी कोई दूसरी या तीसरी दुनिया नहीं है।</li>
</ul>
<ul>
<li>इस्लाम और ईसाई धर्मों का खण्डन &#8211; कोई पैग़म्बर या मसीहा नहीं भेजा जाता है। ईश्वर को अपना सामर्थ्य जताने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि वो सच्चिदानंद है। स्वर्ग, नरक, जिन्न आदि का भी खण्डन।</li>
</ul>
<h2><span id=".E0.A4.AA.E0.A5.8D.E0.A4.B0.E0.A4.AD.E0.A4.BE.E0.A4.B5">सत्यार्थप्रकाश का </span><span id="प्रभाव" class="mw-headline">प्रभाव</span></h2>
<p>स्वामी दयानन्द का मत कई (अन्ध) विश्वासों और मतों का खण्डन करना और वेदों के मत को पुनःप्रकाश में लाने का था। इसलिए कई बार उन्हें प्रचलित हिन्दू , जैन, बौद्ध, इस्लामी और ईसाई मतों की मान्यताओं का खण्डन करना पड़ा। अवतारवाद, शंकराचार्य को शिव का अवतार, राम और कृष्ण को विष्णु नामक सार्वभौम का अवतार मानने वाले कई थे। इसी प्रकार तीर्थ, बालविवाह और जन्म संबंधी जाति (वर्ण व्यवस्था का नया रूप) जैसी व्यवस्थाओं का उन्होंने सप्रमाण खण्डन किया। इससे कई सुधार हिन्दू समाज में आए। कई विश्वास इस्लामी समाज का भी बदला। कुछ इस प्रकार हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>सत्यार्थप्रकाश और ऋषि दयानन्द की जीवनी <a href="https://fundabook.com/ideal-of-revolutionaries-chandrashekhar-azad-hindi/">स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिकारियों</a> की प्रिय पुस्तक बनी। एक अंग्रेज विद्वान शेरोल ने यहाँ तक कहा कि सत्यार्थप्रकाश ब्रिटिश सरकार कि जड़ें उखाड़ने वाला ग्रंथ है। वस्तुतः सत्यार्थप्रकाश उस समय कि कालजयी कृति थी और इस  कालजयी कृति में अंग्रेजों का विरोध भी था जिससे अंग्रेज सरकार को काफी नुकसान हुआ।</li>
</ul>
<ul>
<li>हिन्दुओ के धर्मान्तरण पर रोक लगी और मुसलमानों, ईसाई आदि विधर्मियों की शुद्धि (घर वापसी ) हुई।</li>
</ul>
<ul>
<li><a href="https://fundabook.com/some-unheard-amazing-facts-related-lord-krishna-hindi/">श्रीकृष्ण</a> के ऊपर लगाए हुए <a href="https://fundabook.com/some-unheard-amazing-facts-related-lord-krishna-hindi/">गंदे आरोप और लांछन</a> दूर हुए एवं श्रीकृष्ण का यथार्थ  सत्यस्वरूप प्रकाशित हुआ।</li>
</ul>
<ul>
<li>सत्यार्थप्रकाश ने स्त्री-जाति को  पैरों से उठाकर जगदम्बा के सिंहासन पर बैठा दिया।</li>
</ul>
<ul>
<li>मूर्तिपूजा का स्वरूप बदल गया , पहले मूर्ति को ही  ईश्वर मान चुके थे , अब मूर्तिपूजक भाई बंधू  मूर्तिपूजा  की विभिन्न मनोहारी  व्याख्याएं करने का असफल प्रयास करते हैं।</li>
</ul>
<ul>
<li><strong>विनायक दामोदर सावरकर</strong> के शब्दों में,  &#8220;सत्यार्थप्रकाश ने हिन्दू जाति कि ठंडी रगों में उष्ण रक्त का संचार किया। &#8220;</li>
</ul>
<ul>
<li>सत्यार्थप्रकाश से <a href="https://fundabook.com/interesting-facts-in-hindi/">हिन्दी भाषा</a> का महत्व बढ़ा।</li>
</ul>
<ul>
<li>अकेले सत्यार्थप्रकाश ने अनेकों क्रन्तिकारी और समाज सुधारक पैदा कर दिए।</li>
</ul>
<ul>
<li>सत्यार्थप्रकाश ने वेदों का महत्त्व बढ़ा दिया, वेद की प्रतिष्ठा को हिमालय सदृश चोटी पर स्थापित कर दिया।</li>
</ul>
<ul>
<li>सत्यार्थप्रकाश का प्रभाव विश्वव्यापी हुआ , बाइबिल , कुरान , पुराण , जैन आदि सभी ग्रंथो की बातें बदल गयी , व्याख्याएं बदल गयी। सत्यार्थप्रकाश ने धर्म के क्षेत्र में मानो सम्पूर्ण पृथ्वी पर हलचल मचा दी हो।</li>
</ul>
<ul>
<li>फरवरी 1931 में कलकत्ता से छपने वाले एपिफेनी वीकली में <a href="https://fundabook.com/last-village-of-india-go-to-heaven/">स्वर्ग</a> और <a href="https://fundabook.com/earths-most-dangerous-places-where-noone-survives/">नरक</a> की अवधारणी बदली। साप्ताहिक पत्र लिखता है &#8211; &#8220;What are hell and heaven? ..Hell and heaven are spiritual states; heaven is enjoyment of the presence of God, and Hell Banishment from it&#8221;. इस पर आर्य विचारधारा (सत्यार्थ प्रकाश जिसकी सबसे प्रमुख पुस्तक है) का प्रभाव दिखता है।</li>
</ul>
<ul>
<li>कुरान के भाष्य &#8216;फ़तह उल हमीद&#8217; (प्रशंसा से जीत) ने मुसलमानों के कब्र, पीर या दरगाह निआज़ी को ग़लत बताया। इसी पर मौलाना हाली ने मुसलमानों की ग़ैरमुसलमानों की मूर्ति पूजा पर ऐतराज जताते हुए कहा कि मुसलमानों को नबी को खुदा मानना और मज़ारों पर जाना भी उचित नहीं है।</li>
</ul>
<ul>
<li>पुराणों, साखियों, भागवत और हदीसों की मान्यता घट गई है। उदाहरणार्थ, जबलपुर में सन् १९१५ में आर्य समाजियों के साथ शास्त्रार्थ में मौलाना सनाउल्ला ने हदीसों से पल्ला झाड़ लिया।<sup id="cite_ref-6" class="reference"></sup></li>
</ul>
<h2><span id="हिन्दी_साहित्य_में_सत्यार्थ_प्रकाश" class="mw-headline">हिन्दी साहित्य में सत्यार्थ प्रकाश</span></h2>
<p>हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने अपने ग्रंथों में सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी के उन प्रारंभिक ग्रंथों में माना है, जिनके गद्य की शैली को बाद में सभी ने परम्परा के रूप में ग्रहण किया। सत्यार्थ प्रकाश के प्रकाशन से पहले हिंदी गद्य की भाषा ब्रजभाषा और अवधी से बहुत अधिक प्रभावित थी।</p>
<p>आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास में माना है कि 1868 से 1893 का कालखंड हिंदी गद्य के विकास का समय था।</p>
<p>डॉ. चंद्रभानु सीताराम सोनवणे ने हिंदी गद्य साहित्य में लिखा है कि सत्यार्थ प्रकाश आधुनिक हिंदी का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ है। उनके अनुसार हिन्दी को नई चाल में ढालने में स्वामी दयानन्द सरस्वती का स्थान भारतेंदु हरिश्चंद्र से कम नहीं है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अभी खरीदें</strong></p>
<div style="margin: 0 auto; width: 138px;">
<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: center; margin-bottom: 15px;"><img data-recalc-dims="1" loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-33680" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/button-buy-now-at-amazon.png?resize=140%2C44&#038;ssl=1" alt="" width="140" height="44" /></p>
<p style="text-align: center;"><a class="thirstylinkimg" target="_blank" title="Satyath Prakash Book Maharishi Dayanand Sarswati FlipKart" href="https://fundabook.com/recommends/satyath-prakash-book-maharishi-dayanand-sarswati-flipkart/" data-shortcode="true"><img data-recalc-dims="1" loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-33676" src="https://i0.wp.com/fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/button-view-or-buy-on-flipkart.png?resize=141%2C47&#038;ssl=1" alt="" width="141" height="47" data-mce-src="https://fundabook.com/wp-content/uploads/2022/02/button-view-or-buy-on-flipkart.png" data-mce-selected="1"></a></p>
</div>
<p><a href="https://www.amazon.in/gp/search/ref=as_li_qf_sp_sr_il?ie=UTF8&amp;tag=fundabook-hi-21&amp;keywords=satyarth prakash&amp;index=aps&amp;camp=3638&amp;creative=24630&amp;linkCode=ur2&amp;linkId=dad5f9e83c735d165449b23cc83dd611" target="_blank" rel="noopener"><img decoding="async" class="aligncenter" src="//ws-in.amazon-adsystem.com/widgets/q?_encoding=UTF8&amp;MarketPlace=IN&amp;ASIN=B07DQLT7DS&amp;ServiceVersion=20070822&amp;ID=AsinImage&amp;WS=1&amp;Format=_SL250_&amp;tag=fundabook-hi-21" border="0" /></a></p>
<p><script async src="//affiliate.flipkart.com/affiliate/widgets/FKAffiliateWidgets.js"></script></p>
<p>The post <a href="https://fundabook.com/satyarth-prakash-maharishi-dayanand-saraswati/">सत्यार्थप्रकाश &#8211; अंधविश्वास, पाखण्ड और सामाजिक कुरीतिओं पर चोट करते तथ्य जो आपने कहीं नहीं पढ़े होंगे</a> appeared first on <a href="https://fundabook.com">Interesting Facts, Information in Hindi - रोचक तथ्य</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://fundabook.com/satyarth-prakash-maharishi-dayanand-saraswati/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">33660</post-id>	</item>
	</channel>
</rss>
