जानिए कब से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध और किस तिथि पर किसका श्राद्ध करना चाहिए

62

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए संतान का होना जरुरी माना जाता हैl श्राद्ध की तिथियों में लोग अपने पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करते है और उन्हें जल और पिंड दान देते हैं।

कौन कहलाते हैं पितर

पितर वे व्यक्ति कहलाते है, जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है, उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है।

श्राद्ध क्या होता है

हिन्दू धर्म में भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि से आरम्भ होने वाले पितर पक्ष का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा ही चुकाया जा सकता है।

पितर पक्ष में श्राद्ध करने से पितर गण प्रसन्न रहते हैं। श्राद्ध में पितरों को उम्मीद रहती है, कि हमारे पुत्र-पौत्रादि पिंडदान और तिलांजलि प्रदान करेंगे। हिंदू धर्म शास्त्रों में पितर पक्ष में श्राद्ध अवश्य करने के लिए कहा गया है।

इस बार पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 1 सितंबर से होकर 2 सितंबर तक रहेगा इसीलिए तारीख तो दो है परंतु तिथि एक ही है।

पूर्णिमा, 1 सितंबर, 2 सितंबर
जिन लोगों की मृत्यु पूर्णिमा को हुई हो, उनका श्राद्ध इस दिन करना चाहिए। इस तिथि से पितर पक्ष शुरू होता है।
प्रतिपदा, 3  सितंबर
इस तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी महीनें के किसी भी पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर हुई हो। जैसे  नाना-नानी के परिवार में किसी की मृत्यु हुई हो, और उसकी मृत्यु की तारीख पता न हो,तो उसका श्राद्ध प्रतिपदा पर किया जाता है।
द्वितिया, 4 सितंबर
द्वितिया तिथि को मृत लोगों का श्राद्ध किया जाता है।
तृतीया, 5 सितंबर और 6 सितंबर
जिसकी मृत्यु तृतीया तिथि पर हुई हो, उसका श्राद्ध इस दिन किया जाता है। इस बार दो दिन तृतीया तिथि रहेगी।
चतुर्थी, 7 सितंबर
इस तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु चतुर्थी तिथि को हुई हो।
पंचमी, 8 सितंबर
पंचमी तिथि पर मृत व्यक्ति का श्राद्ध किया जाता है। और अगर किसी अविवाहित व्यक्ति की मृत्यु पंचमी तिथि को हुई है, तो उसका श्राद्ध  भी इस तिथि पर करना चाहिए।
षष्ठी, 9  सितंबर
षष्ठी तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु षष्ठी तिथि पर हुई हो।
सप्तमी, 10 सितंबर
जिस व्यक्ति की मृत्यु किसी भी महीनें और किसी भी पक्ष मे हुई हो , उसका श्राद्ध इस तिथि पर किया जाता है।
अष्टमी, 11 सितंबर
जिन लोगों का देहांत किसी माह की अष्टमी तिथि पर हुई है,, उनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है।
नवमी और दशमी, 12 सितंबर
इस बार नवमी और दशमी तिथि एक ही दिन रहेगी। अगर किसी औरत की मृत्यु हुई हो। और मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो उसका श्राद्ध नवमी तिथि पर किया जाता है। दशमी तिथि पर मृत लोगों का श्राद्ध दशमी तिथि पर ही किया जाता है। अगर माता की मृत्यु हो गई है,तो नवमी तिथि पर उनका श्राद्ध करने की प्रथा है।
एकादशी, 13 सितंबर
इस तिथि पर मृत लोगों का और संन्यासियों का श्राद्ध किया जाता है।
द्वादशी, 14 सितंबर
इस दिन मृत लोगों का श्राद्ध द्वादशी तिथि पर किया जाता है।
त्रयोदशी, 15 सितंबर
अगर किसी बच्चे की मौत हो गई है तो उसका श्राद्ध इस तिथि पर करना चाहिए।
चतुर्दशी, 16 सितंबर
जिन लोगों की मौत किसी दुर्घटना में हो गई है, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि पर करना चाहिए।
अमावस्या, 17 सितंबर
सभी ज्ञात-अज्ञात  पितरों के लिए मोक्ष अमावस्या का श्राद्ध करना चाहिए।

कब से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध

इस वर्ष में श्राद्ध पक्ष 1 सितंबर से 17 सितंबर तक रहेगें । पूर्णिमा से अमावस्या तक 15 तिथियां पितरों के निमित श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन 15 तिथियों में सभी अपने-अपने पितर को याद करते है और उनका श्राद्ध करते हैं।

पितर पक्ष में कैसे करें श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष के दिनों में पूजा और तर्पण करें। पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक ग्रास गाय, दूसरा हिस्सा कुत्ते, तीसरा टुकड़ा कौए और एक भाग मेहमान के लिए रख दें।

गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। जो श्रद्धा पूर्वक किया जाएं उसे श्राद्ध कहते हैं। पुराणों के अनुसार मनुष्य का अगला जीवन पिछले संस्कारों से बनता है।

श्राद्ध कर्म इस भावना से किया जाता है, कि अगला जीवन बेहतर हो। जिन पितरों का हम श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे हमारी मदद करते हैं।