जानिए कब से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध, कौन कहलाते हैं पितर

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आज यानी 10 सितंबर से पितृपक्ष की शुरुआत हो रही है। वहीं 25 सितंबर को इसका समापन होगा। हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए संतान का होना जरुरी माना जाता हैl श्राद्ध की तिथियों में लोग अपने पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करते है और उन्हें जल और पिंड दान देते हैं।

कौन कहलाते हैं पितर

पितर वे व्यक्ति कहलाते है, जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है, उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है।

श्राद्ध क्या होता है

हिन्दू धर्म में भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि से आरम्भ होने वाले पितर पक्ष का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा ही चुकाया जा सकता है।

पितर पक्ष में श्राद्ध करने से पितर गण प्रसन्न रहते हैं। श्राद्ध में पितरों को उम्मीद रहती है, कि हमारे पुत्र-पौत्रादि पिंडदान और तिलांजलि प्रदान करेंगे। हिंदू धर्म शास्त्रों में पितर पक्ष में श्राद्ध अवश्य करने के लिए कहा गया है।

पितृ पक्ष में श्राद्ध 2022 की तिथियां

10 सितंबर    पूर्णिमा का श्राद्ध
11 सितंबर    प्रतिपदा का श्राद्ध
12 सितंबर    द्वितीया का श्राद्ध
12 सितंबर    तृतीया का श्राद्ध
13 सितंबर    चतुर्थी का श्राद्ध
14 सितंबर    पंचमी का श्राद्ध
15 सितंबर    षष्ठी का श्राद्ध
16 सितंबर    सप्तमी का श्राद्ध
17 सितंबर 2022  कृष्ण सप्तमी दोपहर 02: 12  तक
18 सितंबर    अष्टमी का श्राद्ध
19 सितंबर    नवमी श्राद्ध
20 सितंबर    दशमी का श्राद्ध
21 सितंबर    एकादशी का श्राद्ध
22 सितंबर    द्वादशी/संन्यासियों का श्राद्ध
23 सितंबर    त्रयोदशी का श्राद्ध
24 सितंबर    चतुर्दशी का श्राद्ध
25 सितंबर    अमावस्या का श्राद्ध

पितर पक्ष में कैसे करें श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष के दिनों में पूजा और तर्पण करें। पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक ग्रास गाय, दूसरा हिस्सा कुत्ते, तीसरा टुकड़ा कौए और एक भाग मेहमान के लिए रख दें।

गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। जो श्रद्धा पूर्वक किया जाएं उसे श्राद्ध कहते हैं। पुराणों के अनुसार मनुष्य का अगला जीवन पिछले संस्कारों से बनता है।

श्राद्ध कर्म इस भावना से किया जाता है, कि अगला जीवन बेहतर हो। जिन पितरों का हम श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे हमारी मदद करते हैं।