गणेश चतुर्थी की जन्म कथा और महत्व

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गणेश चतुर्थी हिन्दू धर्म का एक बहुत प्रिय पर्व है। ये उत्सव पूरे भारत में बेहद भक्तिभाव और खुशी से मनाया जाता है। इस पर्व को खास तौर से महाराष्‍ट्र और मध्‍य प्रदेश में बेहद उत्‍साह के साथ मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन ही बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्‍य के देवता भगवान गणेश का जन्‍म हुआ था।

10 दिन तक चलने वाला यह उत्‍सव गणेश चतुर्थी से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्‍त होता है।  गणेश चतुर्थी के दिन भक्‍त प्‍यारे बप्‍पा की मूर्ति को घर लाकर उनका सत्‍कार करते हैं। फिर 10वें दिन यानी कि अनंत चतर्दशी को विसर्जन के साथ मंगलमूर्ति भगवान गणेश को विदाई दी जाती है।  साथ ही उनसे अगले बरस जल्‍दी आने का वादा भी लिया जाता है।

भगवान गणेश के जन्म और सिर कटने के बारे में पुराणों में अलग-अलग बातें बताई गई हैं, लेकिन शिवपुराण के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से गणेश जी को जन्म दिया। इसके अलावा उनके सिर कटने की कथा भी शिव पुराण में अलग और ब्रह्मवैवर्त पुराण में अलग है।

शिवपुरण के अनुसार भगवान शिव ने क्रोध में आकर गणेश जी का सिर काट दिया था, वहीं ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि शनि की टेढ़ी नजर गणेश जी के सिर पर पड़ने से उनका सिर कट गया था। जानिए उनकी कथाएं:

शिव पुराण के अनुसार गणेश चतुर्थी की कथा

एक बार मां पार्वती स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक सुंदर बालक को उत्पन्न किया और उसका नाम गणेश रखा। फिर उसे अपना द्वारपाल बना कर दरवाजे पर पहरा देने का आदेश देकर स्नान करने चली गई। थोड़ी देर बाद भगवान शिव आए और द्वार के अन्दर प्रवेश करना चाहा तो गणेश ने उन्हें अन्दर जाने से रोक दिया। इस पर भगवान शिव क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से गणेश के सिर को काट दिया और द्वार के अन्दर चले गए।

जब मां पार्वती ने पुत्र गणेश जी का कटा हुआ सिर देखा तो अत्यंत क्रोधित हो गई। तब ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवताओं ने उनकी स्तुति कर उनको शांत किया और भोलेनाथ से बालक गणेश को जिंदा करने का अनुरोध किया। महामृत्युंजय रुद्र उनके अनुरोध को स्वीकारते हुए एक गज के कटे हुए मस्तक को श्री गणेश के धड़ से जोड़ कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार गणेश चतुर्थी की कथा

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, गणेशजी के जन्म के बाद जब सभी देवी-देवता उनके दर्शन के लिए कैलाश पहुंचे। तब शनिदेव भी वहां पहुंचे, लेकिन उन्होंने बालक गणेश की ओर देखा तक नहीं। माता पार्वती ने इसका कारण पूछा तो शनिदेव ने बताया कि मुझे मेरी पत्नी ने श्राप दिया है कि मैं जिस पर भी दृष्टि डालूंगा, उसका अनिष्ट हो जाएगा।

इसलिए मैं इस बालक की ओर नहीं देख रहा हूं। तब माता पार्वती ने शनिदेव से कहा कि यह संपूर्ण सृष्टि तो ईश्वर के अधीन है। बिना उनकी इच्छा से कुछ नहीं होता। अत: तुम भयमुक्त होकर मेरे बालक को देखो और आशीर्वाद दो। माता पार्वती के कहने पर जैसे ही शनिदेव ने बालक गणेश को देखा तो उसी समय उस बालक का सिर धड़ से अलग हो गया।

बालक गणेश की यह अवस्था देखकर माता पार्वती विलाप करने लगी। माता पार्वती की यह अवस्था देखकर भगवान विष्णु ने एक हाथी के बच्चे का सिर लाकर बालक गणेश के धड़ से जोड़ दिया और उसे पुनर्जीवित कर दिया।

गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा को देखना निषेद क्यों है?

पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा को देखता है वह व्यक्ति मिथ्या दोशम या मिथ्या कलंक का शिकार हो जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण को भाद्रपदा शुक्ला चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखने के लिए अनमोल गहना स्यमंताका की चोरी के झूठे आरोप को सहन करना पड़ा।

भगवान नारद ने भगवान कृष्ण को बताया कि भगवान गणेश ने चंद्र (चंद्रमा) को श्राप  दिया था कि जो कोई भी इस दिन चंद्रमा को देखेगा वह मिथ्या दोषम के साथ शापित हो जाएगा और समाज में अपमानित होगा।

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